अल्मोड़ा अखबार (1871-1918)

अल्मोड़ा अखबार (1871-1918)

अल्मोड़ा अखबार (1871-1918) :- अल्मोड़ा अखबार उत्तराखण्ड का दूसरा लेकिन 48 वर्ष, 1871 से 1918 तक निरन्तर प्रकाशित होने वाला कुमाऊँ का पहला और एकमात्र पत्र था। अल्मोड़ा अखबार प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘पायनियर’ का समकालीन था।

हिन्दी भाषी प्रांतों में स्वतंत्र हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास 1867 में और उत्तराखण्ड में स्थानीय पत्रों का इतिहास 1868 में ‘समय विनोद’ के प्रकाशन के साथ शुरू होता है।

1878 के आसपास ‘समय विनोद’ के बंद हो जाने के बाद ‘अल्मोड़ा अखबार’ का प्रकाशन 1871 में प्रारम्भ हुआ।

‘अल्मोड़ा अखबार’ का सरकारी रजिस्ट्रेशन नम्बर 10 था। अल्मोड़ा अखबार के शुरुआती दिनों में, अखबार की शैली और प्रकाशनों में एक अनिश्चितता और सरकार के प्रति उदारता थी जोकि सन् 1913 के बाद आक्रामकता मे बदल गई।

‘अल्मोड़ा अखबार’ कभी पाक्षिक तो कभी साप्ताहिक रूप से भी प्रकाशित हुआ। अल्मोड़ा अखबार ने अंग्रेजों के अत्याचारों से परेशान हो चुकी पर्वतीय जनता को एक आवाज देने का काम किया। ‘अल्मोड़ा अखबार’ ने पर्वतीय क्षेत्रों की कई सदियों से चली आ रही कुप्रथाओं और समस्याएं जैसे कुली बेगार, कुली बर्दायश, जंगल बंदोबस्त, बाल विवाह, स्त्री शिक्षा, मद्य निषेध, स्त्री अधिकार आदि पर लोगों और अंग्रेज सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

48 वर्षों के लम्बे जीवन काल में अल्मोड़ा अखबार का संपादन क्रमशः बुद्धि बल्लभ पन्त, मुंशी इम्तियाज अली, जीवानंद जोशी, सदानंद सनवाल, विष्णु दत्त जोशी तथा 1913 के पश्चात् बद्रीदत्त पाण्डे ने किया।

बद्री दत्त पाण्डे अल्मोड़ा अखबार के 48 वर्षों के लम्बे जीवन काल के सभी सम्पादकों में सबसे अनुभवी सम्पादक थे। ‘लीडर’, ‘कास्मोपोलिटन’, ‘गढ़वाली’ आदि कई पत्रों में काम कर चुके बद्री दत्त पाण्डे का अनुभव सबसे कहीं अधिक था।

बद्रीदत्त पाण्डे के वर्ष 1913 में ‘अल्मोड़ा अखबार’ के सम्पादक बनते ही अखबार’ की प्रसार संख्या 50-60 से बढ़कर 1500 तक पहुंच गयी थी।

अल्मोड़ा अखबार ने कई कुप्रथाओं, बेगार, स्वराज, जंगलात के कष्टों, स्थानीय नौकरशाही की निरंकुशता, स्त्री अधिकारों और अंग्रेजी हुकूमत के गलत कृत्यों पर गहरी चोट की और जन-जन तक स्थानीय मुद्दों को पहुंचाया। फलस्वरूप लोगों में अंग्रेजी शासन का डर कम होने लगा और चेतना का प्रसार हुआ।

अंग्रेजी हुकूमत को अल्मोड़ा अखबार का यह स्वरूप पसंद नहीं आया और परिणामस्वरूप सरकारी दबाव के चलते 1918 में ‘अल्मोड़ा अखबार’ को बंद कर दिया गया।

अल्मोड़ा अखबार की इस खाली जगह को भरने के लिए 1918 में ब्रदीदत्त पाण्डे ने ‘शक्ति‘ पत्र का संपादन शुरू किया।

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