उत्तराखण्ड में स्थानीय स्व-शासन ढांचे का वर्णन कीजिए

प्रश्न- उत्तराखण्ड में स्थानीय स्व-शासन ढांचे का वर्णन कीजिए। [UKPSC वन क्षेत्राधिकारी मुख्य परीक्षा 2015]
Describe the structure of local self government in Uttarakhand.[UKPSC Forest Officer Main Examination 2015]
Question Answer

स्थानीय स्व-शासन

स्थानीय जनता द्वारा स्थानीय मामलों का प्रबंधन ही स्थानीय स्व-शासन है। स्थानीय स्व-शासन सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है, मूलतः इस सिद्धान्त पर आधारित है कि स्थानीय मुद्दो को केन्द्र व राज्य सरकार की अपेक्षा स्थानीय जनता अधिक बेहतर रूप से समझती है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यह देश के आम नागरिकों के सबसे नजदीक है, जिस कारण यह लोकतंत्र में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने में सक्षम है, इसके कारण ही ग्रामीण प्रदेशों के नागरिक भी लोकतंत्रात्मक संगठनों में रूचि लेते हैं।

भारत में स्थानीय स्व-शासन की अवधारणा

  • वर्ष 1882 में लार्ड रिपन द्वारा स्थानीय सरकार के गठन की पहल की गयी थी। इसी कारण लार्ड रिपन को “भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक” भी कहा जाता है।
  • वर्ष 1919 के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारो एवं भारत शासन अधिनियम, 1935 में भी इसे जगह दी गयी थी।
  • संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण के दौरान स्थानीय स्वशासन को राज्य सूची का विषय बनाकर इसे नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद-40) में शामिल किया गया।
  • वर्ष 1958 में बलवंत राय मेहता समिति ने पंचायती राज पर एक रिपोर्ट पेश करते हुए इसके त्रि-स्तरीय स्वरूप की सिफारिश की।
  • इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले में पंचायती राज लागू कर राजस्थान ऐसा पहला राज्य बना जहां स्थानीय स्वशासन लागू किया गया।
  • वर्ष 1977 में पंचायती राज पर बनी अशोक मेहता समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट 1978 में प्रस्तुत की गयी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रणाली को द्वि-स्तरीय बनाने का सुझाव प्रस्तुत किया।
  • वर्ष 1989 में पी० के० थुंगन समिति ने स्थानीय स्वशासन हेतु सरकारी निकायों को संविधान में जोड़ने की रिपोर्ट प्रेषित की।
  • पी० के० थुंगन समिति के इसी रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1993 में 73वें(पंचायती राज)74वें(नगरीय निकाय) संविधान संशोधन को पारित किया गया।

उत्तराखण्ड में स्थानीय स्व-शासन ढाँचा

स्थानीय स्व-शासन राज्य सरकार के अन्तर्गत आता है तथा इसका निर्वाचन संबंधी सभी कार्य राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है। उत्तराखण्ड राज्य गठन के उपरान्त प्रथम निर्वाचित सरकार द्वारा इसी व्यवस्था को निम्न परिवर्तनों के साथ अपना लिया गया –

  • पंचायती राज निदेशालय एवं जिला पंचायत अनुश्रवण प्रकोष्ठ का गठन।
  • वर्ष 2008 में महिलाओं के आरक्षण को 33% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया।

उत्तराखण्ड में स्थानीय स्वशासन ढांचा

पंचायती राज व्यवस्था

यह एक त्रि-स्तरीय व्यवस्था है, जिसका गठन 73वें संविधान संशोधन के अनुसार किया जाता है। इसमें आने वाले निकायों का विवरण निम्नवत है-

1. जिला पंचायत

  • ये पंचायती राज व्यवस्था का सबसे शीर्ष निकाय है। इसके सदस्यों का चुनाव जिले के 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से किया जाता है।
  • अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव जनाता द्वारा चुने हुए सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रीति से किया जाता है।
  • जिले का मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) इसके सचिव के रूप में कार्य करता है।
  • जिले के अन्तर्गत आने वाले सभी प्रमुख, लोकसभा सदस्य, राज्य सभा सदस्य, राज्य विधानसभा सदस्य इसके पदेन सदस्य होते हैं, जोकि सभी कार्यवाहियों में सम्मिलित हो सकते हैं तथा मत दे सकते हैं। यह केवल अविश्वास प्रस्ताव की कार्यवाही में मत नहीं दे सकते हैं।
  • जिला पंचायत अपने सभी कार्य 6 समितियों द्वारा संपन्न करती है –
    1. नियोजन एवं विकास समिति।
    2. शिक्षा समिति।
    3. स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति।
    4. प्रशासनिक समिति।
    5. जल प्रबंधन एवं जैव विविधता प्रबंधन समिति।
    6. निर्माण कार्य समिति।

2. क्षेत्र पंचायत

  • ये पंचायती व्यवस्था में मध्य स्तरीय निकाय है। इसमें सदस्यों का चुनाव इसके अन्तर्गत आने वाली सभी ग्राम सभाओं के 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से किया जाता है। इसके सदस्यों की कुल संख्या 20 से कम व 40 से अधिक नहीं हो सकती है। अध्यक्ष (प्रमुख) एवं उपाध्यक्ष (उप-प्रमुख) का चुनाव जनाता द्वारा चुने हुए सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रीति से किया जाता है।
  • क्षेत्र पंचायत का सचिव प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) होता है।
  • क्षेत्र पंचायत के अन्तर्गत आने वाले सभी ग्राम प्रधान, लोकसभा सदस्य, राज्य सभा सदस्य, राज्य विधानसभा सदस्य इसके पदेन सदस्य होते हैं, सभी कार्यवाहियों में सम्मिलित हो सकते हैं तथा मत दे सकते हैं। केवल अविश्वास प्रस्ताव की कार्यवाही में मत नहीं दे सकते हैं।
  • जिला पंचायत की भांति ही क्षेत्र पंचायत भी अपने सभी कार्य 6 समितियों द्वारा ही संपन्न करती है। जिनका नाम एवं कार्य जिला पंचायत के ही समान होता है।

3. ग्राम पंचायत

  • पंचायती व्यवस्था की सबसे निचली कड़ी है। ग्राम पंचायत के गठन हेतु पहाड़ी इलाकों में 500 से अधिक और मैदानी इलाकों में 1000 से अधिक व 10,000 तक की आबादी होनी चाहिए। इसमें सदस्यों एवं ग्राम प्रधान का चुनाव इसके अन्तर्गत आने वाली ग्राम सभाओं के 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से किया जाता है।
  • इसके सदस्यों की कुल संख्या 5 से कम व 15 से अधिक नहीं हो सकती है।
  • ग्राम सभा की प्रत्येक वर्ष दो आम बैठके होती हैं। जिसकी अध्यक्षता ग्राम प्रधान करता है।
  • इस स्तर पर भी 6 समितियों द्वारा कार्य सम्पादित किया जाता है। परन्तु शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण समितियों की सभापति महिलाएं ही होती हैं।
  • इन पंचायतों को कुछ कानूनी अधिकार भी होते हैं तथा ये 100 रू0 लगा सकती है परन्तु कारावास की सजा नहीं दे सकती।

नगर-निकाय प्रणाली

यह भी एक त्रि-स्तरीय व्यवस्था है, जिसका गठन 74वें संविधान संशोधन के अनुसार किया गया है ।इसमें आने वाले निकायों का विवरण निम्नवत है –

1. नगर निगम

  • मैदानों में 1 लाख व पहाड़ी क्षेत्र में 90 हजार से अधिक की जनसंख्या वाले इलाकों में इसका गठन किया जाता है।
  • इसके प्रमुख को नगर प्रमुख (मेयर) कहा जाता है तथा इसका चुनाव 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के द्वारा करते हैं।
  • डिप्टी मेयर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा किया जाता है।
  • उत्तराखण्ड राज्य में केवल 6 नगरों में नगर निगम गठित हैं –
    देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, काशीपुर, रूद्रपुर एवं रूड़की।

2. नगरपालिका परिषद

  • जिन नगरों की जनसंख्या 50 हजार से अधिक एवं मैदान में 1 लाख तक व पहाड़ी क्षेत्र में 90 हजार तक होती है वहां नगरपालिका गठित की जाती है ।
  • उत्तराखण्ड राज्य में वर्तमान में कुल 38 नगर पालिका परिषदें हैं।

3. नगर पंचायत

  • जिन नगरों / कस्बों की जनसंख्या 5 हजार से 50 हजार के मध्य होती है वहां पर इसका गठन किया जाता है।
  • नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से किया जाता है।
  • वर्तमान समय में उत्तराखंड राज्य में 46 नगर पंचायतें हैं।

स्थानीय स्वशासन कितना सफल है

स्थानीय स्वशासन की सफलताओं को, उपलब्धियों, समस्याओं एवं सुझावों में बाट कर समझा जा सकता है –

उपलब्धियां

  • समाज का हर व्यक्ति इसके जरिए लोकतंत्र में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करता है।
  • स्थानीय लोगों की समस्याएं, राज्य व केन्द्र सरकार से बेहतर स्थानीय लोग ही समझ सकते हैं।
  • महिलाओं को 50% आरक्षण से महिला सशक्तिकरण में भी सहायक है।
  • नई पीढ़ी के युवाओं के लिए यह एक स्वस्थ्य राजनीति की पाठशाला के रूप में कार्य करती है।

समस्याएँ

  • राज्य सरकार द्वारा अपेक्षित आर्थिक सहायता नहीं दी जाती है। जिस कारण से मूलभूत आवश्यकताएं पूरा करने में बाधा उत्पन्न होती है।
  • जानकारी की कमी के कारण बहुत कम ही ऐसी पंचायतें है जो अधिकृत स्रोतों (बाजार, मेला आदि) से स्थानीय स्तर पर धन अर्जित कर पाती हैं।
  • लोगों का इस प्रणाली की तरफ उदासीन रवैया।

सुझाव

  • अन्य निकायों की तरह स्थानीय निकायों के लिए भी अलग से बजट की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • स्थानीय निकायों द्वारा संपादित कार्यों का अवलोकन सरकार द्वारा समय-समय पर किया जाना चाहिए, जिससे इनका उत्तरदायित्व सुनिश्चित हो।
  • स्थानीय निकायों के बारे में आम जनता में जागरूकता को बढ़ाया जाना चाहिए।
  • चुन कर आये प्रतिनिधियों को उचित प्रशिक्षण व आवश्यक जानकारी उपलब्ध करायी जानी चाहिए जिससे वे अपने कर्तव्यों का सही निर्वाहन कर सकें।

 

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