क्या है IPC की धारा 377 (Article - 377)

क्या है IPC की धारा 377 (Article – 377)

चर्चा का कारण

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फ़ाउंडेशन मामले में दो जजों की बेंच के उस फैसले पर दोबारा विचार करने पर सहमति जता दी है, जिसके तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की। संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया है। चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने पांच LGBT नागरिकों द्वारा दाखिल याचिका को बड़ी बेंच के लिए रेफ़र किया है।

परिचय

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 अध्याय XVI को भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान 1860 में पेश किया गया था। इसमें कहा गया हैं कि कोई भी स्वेच्छा से प्रकृति के खिलाफ किसी भी पुरूष, महिला या पशु के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा और साथ ही जुर्माना भी हो सकता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में धारा 377 को खत्म करने का प्रयास सर्वप्रथम 1991 में शुरू हुआ। ऐतिहासिक प्रकाशन लेस देन गेः ए सिटिजन्स रिपोर्ट में धारा 377 से जुड़ी समस्याओं को बताया गया और इसे निरस्त करने की मांग की गई।
  • नाज फाण्डेशन ने 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय में सहमति के साथ वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को वैध करने की मांग के साथ एक जनहित याचिका दायर की।
  • 2 जुलाई, 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को वैध करार दिया।
  • वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय ने फैसले को निरस्त कर दिया।
  • 15 अप्रैल, 2015 को राष्ट्रीय विविध सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेन्डर व्यक्तियों के पहचान के अधिकार को मान्यता प्रदान की।
  • 2 फरवरी, 2016 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर वाली पीठ ने कहा कि इसकी सुनवाई 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ करेगी।

पक्ष में

  • धारा 377 में गैर प्रजनन यौन कृत्यों यानि अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध माना जाता है।
  • यह धारा विशेष रूप से LGBT समुदाय के लोगों की चिंताओं का कारण इसलिए है क्योंकि उनके मध्य स्थापित होने वाले संबंधों को अप्राकृतिक ही माना जाता है।
  • उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश सरकार जिन्होंने इस कानून को शुरू किया था उन्होंने 1960 के दशक में ही इससे छुटकारा पा लिया था।

विपक्ष में

  • सभी धर्मों में समलैंगिकता को पाप माना गया है। इसे प्रकृत के आदेश के विरूद्ध आचरण माना जाता है और ऐसा करने वाला अपराधी माना जाता है।
  • धारा 377 पारिवारिक संबंधों के लिए बहुत खतरा माना जा रहा है।क्योंकि इससे संबंधों में विखराव उत्पन्न हो सकता है।

आगे की राह

  • प्रत्येक व्यक्ति अपने पसंद का जीवन जीने के लिए स्वतंत्र है। वह अपने घर में क्या करता है इसे किसी व्यक्ति को जानने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन यदि उसके व्यक्तिगत कार्य से समाज पर गलत प्रभाव पड़ रहा है तो उसे रोका जाना अनिवार्य है। साथ ही व्यक्ति को दंडित करना भी आवश्यक है।
  • धारा 377 से समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए ही इस पर कोई निर्णय होना चाहिए।

निष्कर्ष

धारा 377 फिर से चर्चा का विषय बन गया है। यह सरकार और न्यायालय दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर कोई भी निर्णय बहुत ही सोच समझ कर लेना होगा। सामाजिक व्यवस्था को सही और सुचारू रूप से चलाने के लिए इस तरह के मुद्दों पर व्यापक विचार विमर्श की आवश्यकता है।

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