तेजाजी - राजस्थान के लोक देवता

तेजाजी – राजस्थान के लोक देवता

तेजाजी राजस्थान के लोक देवता : राजस्थान के लोक देवता तेजाजी ( Tejaji ) को उनके अनुयायियों द्वारा भगवान शिव का ग्यारहवां अवतार माना जाता है। तेजाजी को राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात आदि कई स्थानों पर लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। (rajasthan ke lok devta notes)

  • तेजाजी का जन्म नागौर जिले के गाँव खड़नाल में 1073 ई. में माघ शुक्ल चतुर्दशी को हुआ था।
  • तेजाजी के पिताजी ताहड़जी व माताजी का नाम रामकुंवरी था।
  • तेजाजी का पिवाह पेमलदे के साथ हुआ था जो कि पनेर नामक गाँव की रहने वाली थी। पनेर नामक गाँव परबतसर के पूर्वी भाग में स्थित है।
  • तेजाजी जब अपनी पत्नी को लाने ससुराल पनेर (नागौर) गये हुए थे तब वहाँ पर एक गुजरी लाछा गुजरी ने अपनी गायों को मेरो से छुड़वाने के लिए तेजाजी से प्रार्थना की। तब तेजाजी ने मेरों से युद्ध किया और लाछा गुजरी की गायों की रक्षा की थी इसलिये तेजाजी को गायों का मुक्तिदाता कहा जाता है।
  • साँपों के देवता, धौलिया वीर, गायों के मुक्तिदाता, काला व बाला के देवता, कृषि कार्यों के उपकारक आदि उपनामों से तेजाजी को जाना जाता है।
  • तेजाजी का गोत्र ‘धौल्या’ गोत्र मे हुआ था जोकि जाटों का गोत्र है इसलिये जाट इनको अपना कुलदेवता मानते हैं।
  • तेजाजी की घोड़ी का नाम ‘लीलण’ था। तेजाजी का मेला हर साल भाद्रपद शुक्ल दशमी को परबतसर नागौर में भरता है।
  • सांप के डसे हुए व्यक्ति को यदि तेजाजी के नाम की 9 गाँठ (तांत) बांध दी जाए तो सांप का जहर नहीं चढ़ता है इसलिये इनको साँपों का देवता कहा जाता है। तेजाजी के पुजारी (जिसे घोड़ले के नाम से जाना जाता है) द्वारा साँप के कटे हुए स्थान पर चूसकर रक्त को बाहर निकाल कर रोगी को ठीक किया जाता है।
  • राजस्थान में किसान खेत में हल चलाते समय ‘तेजा टेर’ तेजाजी की जीवनी गाते हुए बुबाई करता हैं इसलिये तेजाजी को कृषि के देवता भी कहा जाता है। साथ ही तेजाजी की जीवनी को होलिका दहन के बाद भी गाया जाता है।
  • तेजाजी की जीवनियाँ ढूढ़ाडी और नागौरी भाषा में गाई जाती है।
  • तेजाजी का सबसे विशाल मेला परबतसर नागौर में लगता है जो कि एक पशु मेला है। यह मेला भाद्रपद शुक्ल पंचमी से अमावस्या तक लगता है। इससे पहले यह मेला परेन में लगता था। तेजाजी के प्रमुख तीर्थ स्थलों में खड़नाल (नागौर), सुरसरा (अजमेर), परेन (नागौर) प्रमुख हैं।
  • तेजाजी की प्रतिमा को महाराजा अभयसिंह के समय मारवाड़ के हाकिम द्वारा सुरसुरा (अजमेर) से परबतसर (नागौर) लाया गया था तभी से तेजाजी का मेला परबतसर नागौर में भाद्रप शुक्ल दशमी को लगता है।
  • तेजाजी का पूजन भाद्रपद शुक्ल दशमी को अश्वरोही हाथ में माला लिये हुए तथा जीभ को साँप द्वारा डसते हुए मूर्ति के रूप में किया जाता है।
  • तेजाजी को भाद्रपद शुक्ल दशमी को कच्चे दुध का भोग लगाया जाता है इस दिन लोग विलोबणा नहीं बिलौते हैं और न ही दूध में जावण लगाया जाता है।
  • तेजाजी की मृत्यु अजमेर के एक गाँव (सुरसरा) नामक स्थान पर नाग के काटने से हुई थी। ऐसा माना जाता है कि – तेजाजी ने एक नाग को आग में जलने से बचाया था लेकिन वो नागिन को नहीं बचा पाये इसलिये नाग ने गुस्से में तेजाजी को जीभ पर काट लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
  • तेजाजी पर 7 दिसम्बर 2010 को डाक टिकट जारी हुआ था।
  • जाट जाति के लोग तेजाजी के प्रतीक के रूप में गले में चांदी का एक ताबीज डालते हैं।
  • तेजाजी के कार्यों से प्रभावित होकर रामराज नाहटा ने एक राजस्थानी फिल्म ‘वीर तेजाजी’ बनाई थी।
  • तेजाजी की कर्मस्थली बांसी दूगारी (बूंदी) में है।
  • भांवता अजमेर में भी तेजाजी का मंदिर है।

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