बारिश कम होने के कारण, वर्षा का महत्व एवं वर्षा के प्रकार

बारिश कम होने के कारण, वर्षा का महत्व एवं वर्षा के प्रकार

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बारिश का महत्व

समय पर बारिश होना मृदा, वातावरण एवं फसलों की वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है। भारत के किसान अधिकतर वर्षा पर ही निर्भर रहते हैं। बारिश का खेती पर बेहद सकारात्मक प्रभाव पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप फसलों की उपज बेहतर होती है। पृथ्वी के वातावरण को शुद्ध रखने के लिए बारिश का होना बेहद जरूरी है इससे प्रकृति को कई प्रकार से लाभ होता है। समय पर बारिश होना किसानों के लिए बेहद जरुरी होता है।

वर्षा के प्रकार

वर्षा मुख्यतः 3 प्रकार की होती है :-

  • चक्रवातीय वर्षा (Cyclonic rain)

चक्रवातीय वर्षा गर्म एवं ठंडी हवाओं के आपस में मिलने से उत्पन्न होती है। इस प्रकार की वर्षा में गर्म हवा ऊपर की तरफ एवं ठंडी हवा नीचे की तरफ दबाव डालती है जिससे वायु ठंडी होकर वर्षा का रूप ले लेती है। चक्रवातीय वर्षा अधिकतर उष्णकटिबंध एवं शीत कटिबंध क्षेत्रों में होती है।

  • संवहनीय वर्षा (Convectional rain)

संवहनीय वर्षा प्रायः प्रतिदिन होती है। दरअसल, दिन के समय में भीषण गर्मी के कारण धरातल गर्म हो जाती है जिसके कारण वायु गर्म एवं हलकी होकर संवहनीय धाराओं के रूप में ऊपर की तरफ उठती है। जब यह हवा ऊपरी वायुमंडल में पहुंचती है तब कम तापमान के कारण यह हवा ठंडी हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप संघनन की क्रिया होती है और कपासी बादलों का निर्माण होता है। तत्पश्चात बादलों में बिजली कड़कने के साथ-साथ मूसलाधार बारिश होती है।

  • पर्वतकृत वर्षा (Orographical rain)

पर्वतकृत वर्षा पर्वतों के कारण उत्पन्न होने वाली वर्षा है। पर्वत में मौजूद हवा जब मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है तो यह हवा गर्म हो जाती है एवं आसपास के वातावरण को भी गर्म कर देती हैं। भारत के मानसूनी इलाकों में इस प्रकार की वर्षा होती है जिसे पर्वतकृत वर्षा कहते हैं।

बारिश कम होने के कारण

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, बारिश में कमी का आंकड़ा 15 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।  जिसके कारण देश के कई राज्य सूखे के हालत से गुजर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते प्रदूषण के कारण भारत के कई इलाकों में बारिश की प्रक्रिया धीमी होती जा रही है। दरअसल, प्रदूषण के कारण धरती का सतह गर्म नहीं हो पाती जिसके कारण बारिश में तेजी से कमी आ रही है। प्रदूषण के कारण जमीनी सतह का तापमान करीब 38 डिग्री के आसपास रहता है जिससे मानसून में तेजी से बदलाव आ रहा है। किसी भी क्षेत्र में पर्याप्त बारिश होने के लिए कम से कम 40 डिग्री का होना आवश्यक है। एक अध्ययन के अनुसार बढ़ते प्रदूषण के कारण भारत के कई इलाकों में मानसूनी बारिश में लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी आ रही है।

वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ती जनसंख्या के कारण साल दर साल बारिश में तेजी से गिरावट आ रही है। दरअसल, जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने के कारण पृथ्वी का तापमान पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है जिसके कारण जलवाष्प बनने की दर में भी कमी आ रही है। जल वाष्प पानी की वह गैसीय अवस्था है जिसकी मात्रा पृथ्वी के वायुमंडल में निरंतर बनती रहती है। धरती पर मौजूद पानी से जलवाष्प का निर्माण होता है जो वाष्पीकरण के द्वारा होता है एवं संघनन द्वारा जलवाष्प द्रव अवस्था में निरंतर परिवर्तित होता रहता है। बढ़ती जनसंख्या के कारण जलवाष्प की मात्रा पृथ्वी के वायुमंडल में लगातार परिवर्तित हो रही है जिसके कारण बारिश में कमी की समस्या देखी जा सकती है।

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