रेगुलेटिंग एक्ट 1773

रेगुलेटिंग एक्ट 1773

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 (Regulating Act 1773) : ब्रिटिश संसद द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों के कारण बंगाल के कुप्रशासन से उपजी परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए एवं कंपनी के हाथों से राजनीतिक शक्ति छीनने के लिए ‘रेगुलेटिंग एक्ट 1773’ लाया गया था। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरुरत ब्रिटिश संसद को महसूस हुई जिस कारण ब्रिटिश संसद द्वारा 1773 ई. में रेग्युलेटिंग एक्ट पारित किया गया। ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष रूप से उठाया गया यह पहला कदम था।

Regulating Act 1773

  • रेगुलेटिंग एक्ट 1773 ब्रिटिश सरकार के द्वारा उठाया गया पहला ऐसा कदम था जिसके अन्तर्गत कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित किया गया।
    • इससे पहले ब्रिटिश सरकार ने 1767 में केवल कंपनी के कार्यों में हस्तक्षेप करते हुए 40 लाख की वार्षिक आय में 10% अपना हिस्सा तय किया था।
  • इसके द्वारा पहली बार कम्पनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को मान्यता मिली और इसके द्वारा भारत में केन्द्रीय प्रशासन की नींव रखी गयी।
  • रेगुलेटिंग एक्ट 1773 अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा और उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया। लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का पहला गवर्नर जनरल बना।
  • इस एक्ट के द्वारा मद्रास एवं बम्बई के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गाय। इससे पहले बंगाल, मद्रास एवं बम्बई के गवर्नर एक दूसरे के प्रति उत्तरदायी नहीं थे, तथा वे सीधे अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थे।
  • अब 500 पौण्ड अंशधारियों के स्थान पर 1000 पौण्ड अंशधारियों को कोर्ट ऑफ डायरेक्टर(24 सदस्य की गवर्निंग बॉडी) को चुनने का अधिकार दिया गया।
  • कंपनी के डायरेक्टर(24 सदस्य की गवर्निंग बॉडी) से कहा गया कि वे अब से राजस्व, दीवानी एवं सैन्य प्रशासन के संबंध में किये गये सभी प्रकार के कार्यों से ब्रिटिश सरकार को अवगत करायेंगे।
  • कंपनी के डायरेक्टरों का कार्यकाल 4 वर्ष कर दिया गया तथा प्रति वर्ष उनमें से एक चौथाई सदस्यों के स्थान पर नये सदस्यों के निर्वाचन की पद्धति को अपनाया गया।
  • बंगाल में एक प्रशासक मण्डल गठित किया गया। जिसमें गवर्नर जनरल तथा 4 पार्षद नियुक्त किये गए थे।
    • पार्षद नागरिक तथा सैन्य प्रशासन से सम्बन्धित थे।
    • निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता था।
    • इनकी नियुक्त तथा हटाने का अधिकार ब्रिटिश सम्राट एवं कोर्ट ऑफ डायरेक्टरों को था।
    • इस प्रशासक मण्डल का पहला अध्यक्ष लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स बना।
    • 4 पार्षद क्रमशः क्लैवरिंग, मानसल, बरवैल एवं फिलिप फ्रांसिस थे।
  • इस एक्ट के अंतर्गत 1774 में बंगाल में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गयी। इसमें मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त तीन अन्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए। इसके पहले मुख्य न्यायाधीश “सर एलिजा एम्पी” बने। कम्पनी के सभी कर्मचारी इसके अधीन कर दिए गये। न्यायिक विधियां इंग्लैंड के अनुसार ही थीं।
  • कानून बनाने का अधिकार गवर्नर जनरल व उसकी परिषद को दे दिया गया किन्तु लागू करने से पूर्व भारत के सचिव की अनुमति लेना अनिवार्य था।
  • इस समय तक कंपनी में भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुँच चुका था। अतः इस एक्ट के द्वारा कम्पनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार पर रोक लगा दी गयी, एवं उनका वेतन बड़ा दिया गया और किसी भी तरह के उपहार या रिश्वत लेने पर रोक लगा दी गई।
  • इस रेगुलेटिंग एक्ट में वर्ष 1781 में कुछ संशोधन किए गए जोकि निम्नवत है –
    • इस संशोधित एक्ट को “एक्ट ऑफ सेटलमेंट” का नाम दिया गया।
    • कलकत्ता स्थित उच्चतम न्यायालय के कार्यक्षेत्र को परिभाषित कर दिया गया।
    • किसी भी स्थिति में राजस्व एकत्रित करने की व्यवस्था में कोई रूकावट नहीं डाली जाए।
    • नए कानूनों को बनाते व लागू करते समय भारतीय समाज व धार्मिक रीति रिवाजों का सम्मान किया जाए।

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के बाद भी कंपनी का शासन-प्रबन्धन ब्रिटिश सरकार के हाथों में नहीं आ सका, जिस कारण ब्रिटिश संसद द्वारा पिट्स इंडिया एक्ट 1784 पारित किया गया।

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