घुघुतिया त्यार – मकर संक्रान्ति (उत्तरायणी)

घुघुतिया त्यार – मकर संक्रान्ति (उत्तरायणी)

घुघुतिया त्यार (घुघुतिया त्यौहार) – मकर संक्रान्ति (उत्तरायणी) : उत्तराखंड राज्य में मकर संक्रान्ति को घुघुतिया त्यार और उत्तरायणी नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति त्यौहार को कुमाऊँ में ‘उत्तरायणी’ या ‘घुघुतिया त्यार’ तथा गढ़वाल में इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरह “खिचड़ी संक्रान्ति” के नाम से जाना जाता है।

कुमाऊं में मकर संक्रांति को क्या कहते हैं ?

कुमाऊं में मकर संक्रांति को उत्तरायणी कहते हैं।

घुघुतिया त्यार (उत्तरायणी)

मकर संक्रान्ति का त्यौहार पूरे भारतवर्ष में बड़ी ही धूम-धाम से देश देश के कई हिस्सों में इस त्यौहार को कई अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। पोंगल, लोहड़ी जैसे कई ऐसे ही त्यौहार हैं जिन्हें लोग अपने रीति-रिवाजों एवं अपनी पारम्परिक मान्यताओं के अनुसार मानते हैं। इस त्यौहार को उत्तराखण्ड में “उत्तरायणी” के नाम से मनाया जाता है तथा गढ़वाल में इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरह “खिचड़ी संक्रान्ति” के नाम से मनाया जाता है। कुमाऊँ में यह त्यौहार स्थानीय भाषा में घुघुतिया के नाम से जाना जाता है। यह कुमाऊँ का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है और यह एक स्थानीय पर्व होने के साथ साथ हमारा स्थानीय लोक उत्सव भी है। क्योंकि इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन घुघुत बनाया जाता है। जिस कारण कुमाऊँ में मकर संक्रान्ति को उत्तरायणी के साथ साथ घुघुतिया त्यार के नाम से ज्यादा जाना जाता है।

यह त्यौहार विशेषतः बच्चों और कौओं के लिए बना है। इस त्यौहार के दिन सभी बच्चे कौवों को बुलाकर कई तरह के पकवान खिलाते हैं और कहते हैं ” काले कौवा काले घुघुति माला खा ले”।

लोककथा

इस त्यौहार के दिन कुमाऊँ क्षेत्र में बच्चे कौवों को खाना क्यों खिलते है, इसके पीछे एक लोकप्रिय लोककथा है।

बहुत समय पहले कुमाऊं जिले में चन्द्रवंशीय राजा कल्याण चंद शासन करते थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे, परन्तु राजा को एक ही बात का कष्ट था, कि उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी कारण से वे अत्यंत दुखी रहते थे एवं इस बात से उनका मंत्री बहुत खुश होता था क्योंकि उसे पता था, कि निःसंतान राजा के मरने के बाद यह सारा राज्य मेरे हाथों में आ जायेगा।

एक दिन राजा अपनी पत्नी के साथ भगवान बाघनाथ के दर्शन करने उनके मंदिर गए। सच्ची प्रार्थना की कृपा से उनके घर में एक पुत्ररत्न की प्राप्त हुई जिसका नाम राजा ने निर्भयचंद रखा। राजा की पत्नी हमेशा अपने पुत्र के गले में एक मोती की माला बाँधकर रखती थी और अपने पुत्र को प्रेम से ‘घुघुति’ कहकर बुलाती थीं। इस मोती की माला से घुघुति को विशेष लगाव हो गया था। यदि घुघुती किसी वस्तु के लिए ज़िद करता तो उसकी माँ कहती “काले कौवा काले घुघुति माला खा ले” और यह सुनकर कुछ कौवे आ भी जाते जिससे घुघुति अपना हठ छोड़ देता किन्तु जब कभी वे कौवे अत्यंत पास आ जाते तब घुघुति की माँ उन कौवों को कुछ खाने को अवश्य दे देती और इसी कारणवश उन कौवों से घुघुति की अच्छी मित्रता हो गयी।

लेकिन उस बालक को देखकर उस मंत्री की उम्मीद मिट्टी में मिल गयी कि उसे राजपाठ मिलेगा। इसलिए वह उस बच्चे से बैर की भावना रखने लगा। एक दिन मौका पाकर वह उस बच्चे को चुराकर अपने कुछ साथियों के साथ जंगल की ओर भागने लगा परन्तु थोड़ी दूर ही जाने पर एक कौवे ने उन्हें देख लिया ओर जोर-जोर से कांव-कांव करने लगा। यह शोर सुनकर घुघुति उठकर रोने लगा एवं अपनी मोतियों की माला को निकालकर लहराने लगा।

उस कौवे ने वह माला घुघुति से छीन ली। उस कौवे की आवाज सुनकर बहुत सारे उसके साथी कौवे वहाँ इकठ्ठा हो गए एवं मंत्री और उसके साथियों पर अपनी नुकीली चोंचों से हमला कर दिया। हमले से घायल होकर मंत्री और उसके साथी वहाँ से भाग गए। अब अकेला घुघुति उस जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठ गया जिससे सारे कौवे भी उसी पेड़ के ऊपर बैठ गए। जिस कौवे के पास वह मोतियों का हार था वह सीधे राजमहल की ओर उड़ने लगा।

इधर राजमहल में सभी घुघुति की अनुपस्थिति से परेशान थे। तभी वह कौवा घुघुति की माला लिए वहाँ आया और उस माला को घुघुति की माँ के सामने फ़ेंक दिया। यह देखकर सभी को अंदाजा हो गया कि कौवा घुघुति के बारे में कुछ तो जानता है। इसलिए वे सभी कौवे के पीछे चल दिए और थोड़ी दूर जाने पर ही एक पेड़ के नीचे उन्हें अपना पुत्र सोता हुआ दिखाई दिया।

वे लोग घुघुती को अपने साथ ले आये एवं उस दुष्ट मंत्री और उसके साथियों को कठोर दंड दिया। तब उसकी माँ ने कहा कि यदि ये माला और ये कौवे नहीं होते हमें हमारा पुत्र नहीं मिल पाता एवं इसी कारण घुघुति की माँ ने अनेक प्रकार के पकवान बनाकर उन कौवों को घुघुति के हक से खिलवाया तब से ही घुघुतिया त्यौहार कुमाऊं में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन मीठे आटे को जिसे घुघुत भी कहा जाता है माला बनाकर बच्चों द्वारा कौवों को खिलाया जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार

कहा जाता है कि कुमाऊँ में एक राजा था जिसके मंत्री का नाम घुघुतिया था। घुघुतिया एक कुशल योद्धा होने के साथ साथ बड़ा ही महत्वाकांक्षी भी था। धीरे धीरे उसकी महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गयी कि वह खुद राजा बनने की सोचने लगा। एक बार जब वह अपने किसी साथी के साथ राजा को मारकर ख़ुद राजा बनने का षड्यन्त्र रच रहा था तो एक कौए ने उनकी बातें सुन ली। कौआ बड़ा ही चतुर पक्षी समझा जाता है, जिस कारण ही बाल कथाओं में प्यासे कौए की कहानी बड़ी प्रसिद्ध है। कौव्वे को जैसे ही राजा की हत्या की साजिश की जानकारी हुई, उसने तुरन्त आकर राजा को इस बारे में सूचित कर दिया।

राजा को पहले तो विश्वास नहीं हुआ परन्तु उसने घुगुतिया को गिरफ़तार कर कारागार में डाल दिया। जिसके बाद जाँच में बात सही पाये जाने पर राजा द्वारा मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड मिला। कौए की इस चतुराई और राजा के प्रति राजभक्ति से राजा बड़ा प्रभावित हुआ और उसने राज्य भर में घोषणा करवा दी कि मकर संक्रान्ति के दिन सभी राज्यवासी कौव्वों को पकवान बना कर खिलाएँगे। तभी से कौओं के प्रति सौहार्द प्रकट करने वाले इस अनोखे त्यौहार को मनाने की प्रथा की शुरूवात मानी जाती है।

यही नही मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी के इस अवसर पर उत्तराखंड में नदियों के किनारे जहाँ-तहाँ मेले लगते हैं। इनमें दो प्रमुख मेले – बागेश्वर का उत्तरायणी मेला (कुमाँऊ क्षेत्र में) और उत्तरकाशी में माघ मेला (गढ़वाल क्षेत्र में) प्रसिद्ध है।

मकर संक्रान्ति का महत्व

शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं, इसलिये इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से मनाया जाता है । महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चुना। यही नही, कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। यही नही इस दिन से सूर्य उत्तरायण की ओर प्रस्थान करते हैं, उत्तर दिशा में देवताओं का वास भी माना जाता है।

इसलिए इस दिन जप-तप, दान-स्नान, श्राद्ध-तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी भी मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन:प्राप्त होता है। 

विश्व में पशु पक्षियों से सम्बंधित कई त्योहार मनाये जाते हैं पर कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का यह अनोखा त्यौहार उत्तराखण्ड के कुमाऊँ के अलावा शायद कहीं नहीं मनाया जाता है। वैसे कौए की चतुराई के बारे में कहावत है कि मनुष्यों में नौआ और पक्षियों में कौआ अर्थात मानवों में नाई और पक्षियों में कौआ सबसे बुद्धिमान होते हैं। कौए की चतुराई के बारे में कई वैज्ञानिक शोध भी हो चुके हैं जिनसे भी इस बात की पुष्टि हुई है कि कौए का मष्तिष्क अन्य पशु-पक्षियों से अधिक विकसित होता है।

“काले कौवा काले , घुघुति बड़ा खाले,
लै कौवा बड़ा, आपू सबुनै के दिये सुनक ठुल ठुल घड़ा,
रखिये सबुने कै निरोग, सुख सम़ृद्धि दिये रोज रोज।”

अर्थ :- काले कौवा आकर घुघुति (इस दिन के लिये बनाया गया पकवान) बड़ा (उड़द का बना हुआ पकवान) खाले, ले कौव्वे खाने को बड़ा ले, और सभी को सोने के बड़े बड़े घड़े दे, सभी लोगों को स्वस्थ्य रख, हर रोज सुख और समृद्धि दे।

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