हरगोविंद पन्त – उत्तराखंड के समाज सुधारक व स्वतंत्रता सेनानी

हरगोविंद पन्त की जीवनी : पंडित हरगोविंद पन्त का जन्म 19 मई 1885 को चितई गाँव अल्मोड़ा में हुआ था। हरगोविंद पन्त के माता का नाम आनंदी देवी व पिता श्री धर्मानंद पन्त थे जोकि सरकारी कर्मचारी थे। हरगोविंद पन्त की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही विद्यालय में हुई तथा माध्यमिक शिक्षा अल्मोड़ा के इन्टर कॉलेज से हुई। बाद में उच्च शिक्षा के लिए वह इलाहाबाद चले गये, इलाहाबाद के मेयो केंद्रीय कॉलेज से 1909 में विधि (LLB) में स्नातक किया।

कॉलेज के दिनों से ही पंत जी का रुझान राजनीति की तरफ था। उस समय कांग्रेस पार्टी का बोलबाला था अतः पंत जी कांग्रेस में शामिल हो गए और जल्द ही उन्हें उनके अथक प्रयास और पार्टी के हित में कार्य करने के कारण कांग्रेस का जिला अध्यक्ष बना दिया गया और इस पद पर वह 10 बार चुने गए। उन्हें प्रांतीय कांग्रेस समिति के लिए भी चुना गया जिस पद पर वह 12 वर्ष तक कायम रहे। हरगोविंद जी 5 वर्ष तक अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी रहे थे।

1910 में कानून में प्रेक्टिस के लिए रानीखेत आ गये और यही से इन्होंने समाज में चल रहे कुप्रथा और अंग्रेजो द्वारा किये जा रहे अत्याचार के विरुद्ध अपनी आवाज को बुलंद किया। ‘कुमाऊं परिषद’ की स्थापना सितंबर 1916 में, कुछ युवा उत्साही ‘गोविंद बल्लाभ पंत, हरगोबिंद पंत, बद्री दत्त पांडे, इंद्राल शाह, मोहन सिंह दमवाल, चंद्र लाल शाह, प्रेम बल्लभ पांडे, भोला दत्त पांडे और लक्ष्मी दत्त शास्त्री’ ने की। यह एक क्षेत्रिय राजनीतिक संगठन था।

Hargovind Pant
Pt. Hargovind Pant
जन्म19 मई, 1885
मृत्यु18 मई, 1957
जन्म-स्थानचितई, अल्मोड़ा
पुस्तकसल्ट पर कैसी बीती
माताआनंदी देवी
पिताश्री धर्मानंद पन्त

कुमाऊँ परिषद् के गठन का उद्देश्य लोगों को एकत्रित करके समाज में चल रहे कुरीतियों और अंग्रेज़ शासकों के अत्याचार के विरुद्ध एक होकर लड़ना था। पंडित हरगोविंद पन्त जी ने कुलीन ब्रह्मणों द्वारा हल न चलाने की प्रथा को 1928 में बागेश्वर में स्वयं हल चला कर तोड़ दिया। इसी तरह इन्होने समाज में चल रहे कई अन्य भेदभावों के खिलाफ लोगो में जागरूकता फैलाई और खुद भी इन कुरीतियों के खिलाफ लड़े।

हरगोविंद पंत पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘सल्ट सत्याग्रह‘ की शुरुआत की थी और 1942 में अल्मोड़ा में “भारत छोड़ो” जैसे आंदोलनों की शुरुआत की थी। इनकी पत्नी श्रीमती दुर्गा देवी पंत ने हर कदम पर पंत जी का साथ दिया। हरगोविंद पंत जी 9 वर्ष तक जिला बोर्ड, अल्मोड़ा के अध्यक्ष भी रहे।

1951 में हरगोविंद पंत जी को उत्तर प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) के रूप में चयनित किया गया। पंत जी 02 जनवरी 1951 से 09 अप्रैल 1957 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष रहे।¹

हरगोविंद पंत एक उच्च शिक्षाविद भी थे, उन्होंने संस्कृत स्कूल की स्थपना भी की थी। वह स्थानीय अख़बारों के लिए लेख भी लिखा करते थे। साथ ही उन्होंने “सल्ट पर कैसी बीती” पुस्तक की रचना भी की थी।

कुमाऊँ परिषद उत्तराखंड की पहली मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी थी।

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