मध्य प्रदेश के प्रमुख लोक संगीत (Major Folk Music of Madhya Pradesh)

मध्य प्रदेश के प्रमुख लोक संगीत

मध्य प्रदेश के प्रमुख लोक संगीत (Major Folk Music of Madhya Pradesh) : मध्य प्रदेश का लोक संगीत क्षेत्र की विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं से प्रभावित रहा है। इसमें भजन, लावणी और कई अन्य शैलियों की विविधता शामिल है। प्रत्येक शैली की अपनी अनूठी शैली और ध्वनि होती है जो क्षेत्र की संस्कृति को दर्शाती है। इस लेख में मध्य प्रदेश की कुछ प्रमुख लोक संगीत के बारे में बताया गया है।

मध्य प्रदेश के प्रमुख लोक संगीत (Major Folk Music of Madhya Pradesh)

मध्य प्रदेश के प्रमुख लोक संगीत कुछ इस प्रकार हैं:-

  • गरबा गीत
  • आल्हा गीत
  • निर्गुण गायन शैली
  • कलगी तुर्रा
  • नागपंथी गायन
  • फाग गायन
  • हीड गायन
  • संजा गीत
  • लावणी गीत
  • बरसाती बरता
  • देवासी गायन
  • बेरायता गायन
  • जगदेव का पुरवा
  • बसदेवा गायन
  • बिदेसिया गायन
  • बांस गीत
  • पंडवानी गीत
  • घोटुल पाता गीत
  • लोरिक चंदा गीत
  • ददरिया गीत

गरबा गीत (Garba Geet)

गरबा गीत को मध्यप्रदेश में गरबा उत्सव के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है। यह गीत झाबुआ के आदिवासी समुदाय का प्रमुख गीत भी माना जाता है। यह नवरात्रि पर्व पर गाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का गीत होता है जिसमें गरबा की विषय वस्तु भक्ति, हास्य परक एवं श्रृंगार का प्रदर्शन किया जाता है। इसके अलावा इस गीत को निमाड़ अंचल में पुरुष परक के लोक गायन के रूप में भी जाना जाता है।

आल्हा गीत (Aalha Geet)

आल्हा गीत लोकगीत की वह विधा है जिसकी शुरुआत बुंदेलखंड के महोबा नामक क्षेत्र से हुई थी। इस गीत को मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तरी भारत के लोकप्रिय गीत के रूप में भी जाना जाता है। आल्हा गीत वास्तव में अवधी एवं बुंदेली की एक प्रसिद्ध कविता है जो मुख्य रूप से वीर गाथा काल के प्रसिद्ध कवि जगमीत द्वारा रचित एवं परमल रासो पर आधारित है। इस गीत को बुंदेलखंड में वर्षा ऋतु के दौरान रात के समय पर गाया जाता है।

निर्गुण गायन शैली (Nirgun Gayan Saheli)

निर्गुण गायन शैली वह लोकगीत है जो मध्य प्रदेश के मालवा अंचल नामक क्षेत्र में प्रसिद्ध है। यह लोकगीत आमतौर पर साधु एवं भिक्षुकों के द्वारा गाया जाने वाला एक प्रमुख गीत माना जाता है। यह एक प्रकार का भक्ति गीत है जिसकी रचना कबीर, मीरा, सिंगाजी एवं दादू जैसे संतों के द्वारा की गयी है। निर्गुण गायन शैली में एक विशेष प्रकार का वाद्य यंत्र बजाया जाता है। इस गीत को संत सिंगाजी भजन के नाम से भी जाना जाता है।

कलगी-तुर्रा

कलगी-तुर्रा वह गीत है जिसे मुख्य रूप से मध्य प्रदेश में गाया जाता है। इस संगीत में गायन के दो दल मौजूद होते हैं जिसके पहले दल को कलगी एवं दूसरे दल को तुर्रा के नाम से जाना जाता है। इन दोनों दलों में गीतकार अपने साथी कलाकार के साथ भगवान श्री गणेश एवं मां सरस्वती की वंदना करके अपने इष्ट देव को प्रसन्न करते हैं। यह मुख्य रूप से रात के समय में गाया जाने वाला एक लोकगीत है जिसकी गायन शैली प्रतिस्पर्धात्मक होती है। इस प्रकार के गीत में पौराणिक कथाओं, महाभारत की कथा एवं वर्तमान प्रसंगों का गायन किया जाता है।

नागपंथी गायन (Nagpanthi Gayan)

नागपंथी गायक मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल में गाया जाने वाला पुरुषों का प्रमुख गीत होता है। यह गीत आमतौर पर किसी विशेष अवसर या त्योहारों पर गाया जाता है जिसमें भगवान श्री कृष्ण की रासलीलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। यह गीत मुख्य रूप से नागपंथी लोगों के द्वारा गाया जाता है। नागपंथी गायन का आयोजन मृदंग एवं ढोल के साथ एकल या सामूहिक तौर पर किया जाता है।

फाग गायन (Fag Gayan)

फाग गायन को मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड, निमाड़ एवं बघेलखंड नामक क्षेत्र में होली के अवसर पर गाया जाता है। माना जाता है कि यह गीत मूल रूप से उत्तर प्रदेश का लोकगीत है जिसे मध्य प्रदेश में भी व्यापक रूप से गाया जाता है। इसमें होली खेलने, प्रकृति की सुंदरता एवं राधा कृष्ण के प्रेम का वर्णन विभिन्न प्रकार के गीतों के माध्यम से किया जाता है। फाग गायन को शास्त्रीय संगीत एवं उप शास्त्रीय संगीत के रूप में भी गाया जा सकता है। इसमें सामूहिक गायन शैली का प्रभाव देखने को मिलता है।

हीड गायन

हीड गायन मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में गाया जाने वाला एक प्रमुख गीत है जिसे मुख्य रूप से श्रवण के माह में गाया जाता है। इस प्रकार के गीत में लगभग ग्यारह प्रकार की देवियों की कथा एवं कृषि संस्कृति को सम्मिलित करके उसका वर्णन किया जाता है। हीड गायन में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ शैली देखने को मिलती है।

संजा गीत (Sanja Geet)

संजा गीत मध्य प्रदेश का प्रमुख गीत माना जाता है। इस गीत को पित्र पक्ष में संध्या के समय में गाया जाता है जिसके कारण इसे संध्या गीत भी कहा जाता है। यह गीत मध्य प्रदेश के मालवा नामक क्षेत्र में आदिवासियों द्वारा गाया जाने वाला प्रमुख गीत होता है। इस दिन आदिवासी घरों की अविवाहित लड़कियां गोबर एवं फूल-पत्तियों से एक दीवार पर संजा की आकृति बनाकर मधुर गीत गाती हैं। इसके अलावा यह लड़कियां संजा पर्व के दिन घर-घर जाकर संझादेवी को मनाते हुए प्रसाद वितरण भी करती हैं।

लावणी गीत (Lavani Geet)

लावणी गीत मध्य प्रदेश के मालवा एवं निमाड़ अंचल में मुख्य रूप से गाया जाता है। यह गीत अपने शक्तिशाली लय के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। इसे मध्य प्रदेश के साथ-साथ भारत के अन्य क्षेत्रों में भी गाया जाता है। लावणी गीत भारत के लोकप्रिय गीतों में से एक है। इसका आयोजन विशेष रूप से ढोलक की धुन के ऊपर किया जाता है। यह एक पारंपरिक गीत है जिसमें गीत एवं नृत्य का सुंदर संयोजन देखने को मिलता है। इस गीत का आयोजन महाराष्ट्र एवं दक्षिणी मध्य प्रदेश में महिलाओं द्वारा लगभग नौ गज लंबी साड़ी पहनकर किया जाता है।

बरसाती बरता (Barsati Barta)

बरसाती बरता वह गीत है जिसे मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मालवा नामक क्षेत्र में वर्षा के दौरान गांव की महिलाओं के द्वारा गाया जाता है। इस गीत में ‘बरता’ का अर्थ है ‘बातचीत’ जिसे गीत के माध्यम से गाया जाता है। बरसाती बरता में ऋतु कथा गीत एवं बारहमासा गीत भी गाए जाते हैं। इसकी गायन शैली सामूहिक गायन शैली को प्रदर्शित करती है।

देवासी गायन (Devasi Gayan)

देवासी गायन मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रमुख गीत माना जाता है जिसे मुख्य रूप से दिवाली के अवसर पर गाया जाता है। इस गीत में राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंग एवं वीर रस युक्त दोहे का वर्णन किया जाता है। इस प्रकार के गीत में द्रुत नृत्य सहित दोहा गायन शैली का प्रयोग किया जाता है। देवासी गायन में ‘देवासी’ का तात्पर्य देवों के वास या देवों के वंशज के होने से होता है।

बेरायता गायन

बेरायता गायन मध्य प्रदेश के प्रमुख गीतों में से एक माना जाता है जिसे मुख्य रूप से धार्मिक अवसरों पर रात के समय में गाया जाता है। यह गीत मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड नामक क्षेत्र में आदिवासियों द्वारा गाया जाने वाला प्रमुख गीत है जिसमें पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक चित्रण एवं लोकनायकों की कथा सम्मिलित होती है। इसके अलावा बेरायता गायन में महाभारत एवं रामायण जैसी कथा एवं प्रसंगो का गायन भी किया जाता है।

जगदेव का पुरवा (Jagdev Purva)

जगदेव का पुरवा मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड नामक क्षेत्र के प्रमुख लोक गीतों में से एक है जिसे मुख्य रूप से चैत्र के माह में गाया जाता है। इस गीत में देवी की स्तुति से संबंधित भजन का आयोजन किया जाता है जिसे सामूहिक तौर पर गाया जाता है।

बसदेवा गायन (Basadeva Gaayan)

बसदेवा गायन को मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड नामक क्षेत्र में कई दशकों से गाया जाता है जिसका उद्देश्य समाज को मानवीय गुणों का संदेश देना होता है। बसदेवा गायन को हरबोले, जय गंगान एवं भटरी बाभन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें मुख्य रूप से भजन शैली का उपयोग किया जाता है। इस गीत को हरबोले जनजाति के द्वारा अपने यजमान के समक्ष दिन में गाया जाता है। बसदेवा गायन में मुख्य रूप से रामायण की कथा, श्रवण कुमार की कथा, कर्ण की कथा, महाभारत की कथा आदि का उपयोग किया जाता है।

बिदेसिया गायन (Bidesia Gayan)

बिदेसिया गीत मध्य प्रदेश के बघेलखंड नामक क्षेत्र में गाया जाता है। इस गीत को नव विवाहित महिलाएं अपने घर से दूर रहने वाले पति की याद में गाती है। कहा जाता है कि एक महिला बटोही (राहगीर) के माध्यम से इस गीत को अपने पति तक सुपुर्द करती हैं। माना जाता है कि इस गीत की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश एवं बिहार के राज्यों से हुई है। इस गीत में लोकनायक एवं नायिका के मिलन की अभिलाषा प्रदर्शित की जाती है। यह एक लंबा गीत होता है जिसमें एकल एवं सामूहिक गायन शैली का प्रभाव देखने को मिलता है।

बांस गीत (Bans Geet)

बांस गीत मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ नामक क्षेत्र के प्रमुख गीतों में से एक माना जाता है जिसमें यादव जातियों द्वारा बांस के बने हुए वाद्य यंत्रों के साथ विभिन्न प्रकार के गीतों का आयोजन किया जाता है। यह मध्य प्रदेश का प्रमुख लोकगीत भी माना जाता है। यह गीत आमतौर पर अहिर एवं राउत (यदुवंशी) जाति के लोगों द्वारा गाया जाता है। कहा जाता है कि बांस गीत गाने वाले गायक स्वयं बांस की लकड़ी से वाद्य यंत्र का निर्माण करते हैं जिसे ‘मोहरी’ के नाम से जाना जाता है।

पंडवानी गीत (Pandwani Geet)

पंडवानी गीत मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के शहडोल, बालाघाट एवं अनूपपुर नामक क्षेत्रों में गाया जाता है जिसमें पांडव की कथा का संगीत एवं कथा के माध्यम से वर्णन किया जाता है। इस गीत में महाकाव्य महाभारत के पांडवों की कथा सुनाई जाती है जिसमें सभी पांडवों के किरदारों का वर्णन किया जाता है। कहा जाता है कि पंडवानी गीत मध्य प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में मौजूद आदिवासियों के गायन की एक मुख्य परंपरा है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में पंडवानी गीत को एक नाटकीय रूप भी दिया जाता है जो इस गीत को अधिक प्रभावशाली बनाता है।

घोटुल पाता गीत (Ghotul Pata Geet)

घोटुल पाता गीत को मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मुड़िया आदिवासी क्षेत्रों में गाया जाता है। इस गीत को गांव के बच्चे या किशोर सामूहिक रूप से गाते हैं। घोटुल पाता गीत को ‘शोक गीत’ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह गीत विशेष रूप से मृत्यु के समय पर गाया जाता है। मध्य प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में गोंड़ एवं मुड़िया जनजातियों द्वारा इस गीत को गाने की एक विशेष परंपरा है।

लोरिक चंदा गीत (Lorik Chanda Geet)

लोरिक चंदा गीत मध्य प्रदेश के प्रमुख लोक गीतों में से एक माना जाता है। इस गीत में मुख्य रूप से लोरिक-चंदा की प्रेम कथा को संगीत के माध्यम से सुनाया जाता है। यह मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक लोक गीतों में से एक है जो लोरिक एवं चंदा के जीवन प्रसंगों के भाव को वर्णित करता है। इस गीत को अहीर जाति का ‘रामायण’ भी कहा जाता है। इसे मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तरी भारत के कुछ क्षेत्रों में भी गाया जाता है। इस गीत में उच्च स्वर सहित कथात्मक गायन शैली का प्रयोग किया जाता है।

ददरिया गीत (Dadariya Geet)

ददरिया गीत को मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के बैगा आदिवासी क्षेत्रों में किसी विशेष अवसर पर गाया जाता है। इस गीत को महिलाएं एवं पुरुष एक साथ मिलकर या अलग-अलग गाते हैं। ददरिया गीत की विशेषता यह है कि इस गीत को सवाल-जवाब के रूप में गाया जाता है जिसमें एक दल सवाल करता है एवं दूसरा दल उस सवाल का जवाब गीत के रूप में देता है। ददरिया गीत में प्राचीन कथाओं के साथ-साथ जटिल रहस्यों का भी वर्णन किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से सामूहिक कथा गायन शैली का उपयोग किया जाता है।

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