मैती आन्दोलन (Maiti Andolan)

मैती आन्दोलन (Maiti Andolan)

उत्तराखंड राज्य में पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी कई आन्दोलन पहले से ही चले आ रहे है, जैसे- चिपको आन्दोलन। इसी तरह उत्तराखंड में एक और आन्दोलन चला, जिसका नाम ‘मैती आन्दोलन’ है। आज जो एक सामाजिक रीति की तरह समूचे गढ़वाल में प्रसिद्ध है। जिसमे सामान्य जनमानस बढ-चढ कर भाग लेते है। यह आन्दोलन पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अनुठी मिसाल कायम कर चूका है। जो आज गढ़वाल में ही नही अपितु समूचे विश्व में भी अपनी छाप छोड़ चूका है।

Maiti Andolan

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मैती का तात्पर्य

उत्तराखंड राज्य में ‘मैत’ शब्द का मतलब ‘मायका’ होता है, और ‘मैती’ शब्द का अर्थ ‘मायके वाले’ से है। मैती आन्दोलन का अभिप्राय उससें है, जब किसी भी लड़की की शादी हो रही हो, वह फेरे लेने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच एक पेड़ लगाकर उसे भी अपना मैती बनाती है। जिस की देख-रेख उसके मैती अर्थात् मायके वाले अपने घर के सदस्य (पुत्री या बहिन) के सामान करते है।

आन्दोलन की प्रेरणा

            मैती आन्दोलन के जनक श्री कल्याण सिंह रावत जी कहते है की, इस आन्दोलन की प्रेरणा उन्हें चिपको आंदोलन से मिली। जब सरकारी वृक्षारोपण अभियान विफल हो रहे थे। एक ही जगह पर पांच-पांच बार पेड़ लगाए जाते पर उसका नतीजा शून्य होता। इतनी बार पेड़ लगाने के बावजूद पेड़ दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इन हालात को देखते हुए मन में यह बात आई कि जब तक हम लोगों को भावनात्मक रूप से सक्रिय नहीं करेंगे, तब तक वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम सफल नहीं हो सकते। जब लोग भावनात्मक रूप से वृक्षारोपण से जुडेंगे तो पेड़ लगाने के बाद उसके चारों ओर दीवार या बाड़ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लोग खुद ही उसकी सुरक्षा करेंगे। इस तरह मैती की शुरुआत हुई।

आन्दोलन की शुरुआत

इस पर्यावरणीय आन्दोलन की शुरुआत 1994 में चमोली के ग्वालदम राजकीय इण्टर कालेज के जीव विज्ञान प्रवक्ता ‘श्री कल्याण सिंह रावत जी’ द्वारा की गई। इस आन्दोलन के तहत रावत जी ने सबसे पहले स्कूली बच्चों को प्रेरित किया, फिर धीरे-धीरे समूचे गाँव के लोगों को प्रेरित करने का कार्य किया। रावत जी के अनेक अभिनव प्रयोगों और गरीबों, विकलांगो, महिलाओं और छात्रों के बीच सामाजिक कार्यों के कारण मैती संगठन की पहचान सभी वर्गों के बीच बनाईं। इसके तहत गढ़वाल के किसी गांव में किसी लड़की की शादी होती है, तो विदाई के समय मैती बहनों द्वारा दूल्हा-दुल्हन को गांव के एक निश्चित स्थान पर ले जाकर फलदार पौधा दिया जाता है। वैदिक मंत्रें द्वारा दूल्हा इस पौधो को रोपित करता है तथा दुल्हन इसे पानी से सींचती है, फिर ब्राह्मण द्वारा इस नव दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया जाता है। दूल्हा अपनी इच्छा अनुसार मैती बहनों को पैसे भी देता है। जिसका उपयोग पर्यावरण सुधारक कार्यों में और समाज के निर्धन बच्चों के पठन-पाठन में किया जाता है।

आन्दोलन का परिणाम

            आज मैती एक आन्दोलन के ही रूप में नही, अपितु लोगो के लिए एक भावनात्मक लगाव के रूप में समूचे गढ़वाल में प्रसिद्ध है। यही कारण है, की आज जब भी गढ़वाल में कोई शादी का कार्यक्रम होता है, तो शादी के कार्ड में मैती कार्यक्रम का जिक्र भी होता है। मैती बहनों ने पूरे उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण के अलावा वन्यजीवों की रक्षा के साथ अंधविश्वास के खिलाफ न सिर्फ चेतना जगाई बल्कि लंबा संघर्ष भी किया। चौरींखाल पौड़ी गढ़वाल में बूंखाल मेले के दौरान पशुवध के खिलाफ संघर्ष किया। संघर्ष का परिणाम यह हुआ है कि जहां हर वर्ष इस मेले में चार सौ भैंसों की बलि दी जाती थी, वहीं उनकी संख्या अब चालीस से भी कम हो गई है।  मैती संगठन ने पूरे उत्तराखंड में वन्य़प्राणियों के प्रति प्रेम पैदा करने के लिए आठ सौ किलोमीटर की महायात्रा का आयोजन किया और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए लोगों को जागरुक किया।

अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के कई राज्यों में भी अपने जड़ें जमा चुका है। जिनमे से कुछ राज्यों में तो वहां की पाठ्य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है। कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़ कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गईं। वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरु कर दिया। अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं। मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं।

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