मौर्य साम्राज्य

मौर्य साम्राज्य

चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322-321 ई० पू० अपने गुरु चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य और असली नाम विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता था, की सहायता से मगध साम्राज्य पर अपना आधिपत्य किया। जहाँ नंदवंश के राजा घनानंद (नंदराज) का शासन था। इसके साथ ही मगध में नंदवंश का पतन हुआ और विशाल मौर्य साम्राज्य का उद्भव हुआ, जोकि 323 ईसा पूर्व से 184 ईसा पूर्व तक रहा। इसने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र को बनाया जिसे वर्तमान में पटना (बिहार) के नाम से जाना जाता है।

चन्द्रगुप्त मौर्य (322 से 298 ई० पू० तक)

चन्द्रगुप्त मौर्य ने ही मौर्यवंश की नींव रखी और विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। चन्द्रगुप्त का साम्राज्य उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कर्णाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से लेकर उत्तर में फारस (वर्तमान ईरान) तक फैला हुआ था। चन्द्रगुप्त के शासन में चाणक्य को प्रधानमंत्री का पद प्राप्त था। चाणक्य ने ‘अर्थशास्त्र‘ नामक ग्रन्थ की रचना भी की थी, जिसमें प्रशासनिक नियमों का उल्लेख किया गया है।

चन्द्रगुप्त ने 305 ई० पू० यूनानी शासक सेल्यूकस (सिकंदर का सेनापति) को युद्ध में पराजित किया और संधि स्वरूप सेल्यूकस की बेटी से चन्द्रगुप्त का विवाह हुआ। सेल्यूकस ने ही मेगस्थनीज़ को अपना राजदूत बनाकर चन्द्रगुप्त के दरबार भेजा था, जिसने ‘इंडिका‘ नामक पुस्तक की रचना की जिसमें मौर्य साम्राज्य की भव्यता और शासन-प्रशासन प्रणाली का सजीव वर्णन किया गया है।


चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायी थे, उसने जैन मुनि भद्रबाहु से जैन धर्म की शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की थी। एक किवदंती के अनुसार यह भी कहा जाता है कि राज्य में 12 साल लम्बा अकाल पड़ने पर दुखी होकर चन्द्रगुप्त ने राज-पाठ त्याग दिया और जैन मुनि भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (मैसूर) में जाकर तपस्या में लीन हो गये और वहीँ 298 ई० पू० देह त्याग किया।

यूनानी लेखक जस्टिन ने चन्द्रगुप्त को सैण्ड्रोकोट्स कहा है, जबकि एपियन और प्लूटार्क ने एण्ड्रोकोट्स कहा है। बौद्ध साहित्य के ग्रन्थ महावंश में चन्द्रगुप्त का उल्लेख मिलता है, जिसमें उसे क्षत्रिय बताया गया है। जबकि विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राक्षस में  चन्द्रगुप्त मौर्य के लिये ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है निम्न मूल का या छोटी जाती का। चन्द्रगुप्त के दक्षिण में विजय का उल्लेख तमिलग्रंथ अहनानूर एवं मुरनानूर में मिलता है।

चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन प्रणाली राजतंत्रात्मक थी जिसके लिए मंत्रिपरिषद का गठन किया गया था। तथा सभी कार्यों को विभागों में बांटा गया था और विभाग के प्रमुख या अध्यक्ष को सूत्राध्यक्ष कहा जाता था। माप-तौल विभाग के अध्यक्ष को पितावध्यक्ष, कृषि विभाग के अध्यक्ष को सीताध्यक्ष, व्यापार कर आदि जमा करने वाले को शुल्काध्यक्ष, आर्थिक निति बनाने व आय-व्यय का लेखा जोखा रखने वाले को सन्निधाता, कारखाना सँभालने वाले को कार्मान्तिरक कहा जाता था। इसी तरह सुराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, अश्वाध्यक्ष, देवताध्यक्ष आदि कई पद व अधिकारी मौर्यकाल में हुआ करते थे।

बिन्दुसार (298 से 272  ई० पू० तक)

चन्द्रगुप्त के बाद उसका उत्तराधिकारी बिन्दुसार मौर्य सिंघासन पर आसीन हुआ। इसके नाम को लेकर कई मतभेद हैं, पुराणों के अनुसार बिन्दुसार को वारिसार और भद्रासार पुकारा गया है। वहीँ जैन ग्रन्थ राजबलिकथा के अनुसार सिंहासेन को चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बताया गया है। परन्तु बौद्ध ग्रंथों महावंश और दीपवंश में चन्द्रगुप्त के उत्तराधिकारी को बिन्दुसार नाम से ही दर्शाया गया है। लेकिन चीनी ग्रन्थ फा-यूएन चु-लिन में बिन्दुसार को बिंदुपाल पुकारा गया है।

बिन्दुसार को यूनानी साहित्य में अमित्रोकेट्स या अभित्रघात नाम से जाना गया है, जहाँ अभित्रघात का अर्थ होता है शत्रुनाशक या शत्रु का नाश करने वाला। चाणक्य बिन्दुसार का भी प्रधानमंत्री था।

प्लिनी के अनुसार मिश्र के शासक टॉलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस (Ptolemy II Philadelphus) ने डायोनियस (Dionysios) नामक राजदूत को बिन्दुसार के दरबार में भेजा था। स्ट्रेबो के अनुसार सीरिया के शासक एण्टियोक्स ने डायमैक्स नामक राजदूत को भेजा था।

पुराणों के अनुसार बिन्दुसार ने 24 से 25 वर्ष तक शासन किया था परन्तु बौद्ध ग्रन्थ महावंश के अनुसार उसका शासन काल 27 वर्ष का था।

बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान के अनुसार बिन्दुसार के शासन में तक्षशिला में विद्रोह हुआ था जहाँ बिन्दुसार का पुत्र सुषीभ शासन करता था जो इस विद्रोह को रोकने में नाकाम रहा, जिस कारण बिन्दुसार ने अपने दूसरे बेटे अशोक को वहां भेजा जिसने वहां पनपे विद्रोह का पूर्णतः दमन कर दिया।

महान सम्राट अशोक (273 से 232 ई० पू० तक)

बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अशोक मौर्य साम्राज्य का शासक बना जिसने विश्व इतिहास में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। एक किंवदन्ती यह भी है कि अशोक ने अपने 99 भाईयों का वध करके मौर्य सिंहासन पर अपना अधिपत्य किया था। बौद्ध ग्रंथों में अशोक को क्रोधी और हिंसक सम्राट माना गया है। परन्तु सम्राट अशोक को एक ऐसे राजा के रूप में भी जाना जाता है जिसने हिंसा और क्रोध त्यागकर अहिंसा का मार्ग अपनाया और प्रेम व शांति पथ पर चलकर विश्व बंधुत्व की मिसाल पेश की।

सिंहली – बौद्ध ग्रन्थ में दीपवंश में अशोक को प्रियदर्शन और प्रियदर्शी कहा गया है। ग्रंथों और अभिलेखों में देवनामपियदशी कहा गया है।

अशोक ने अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष में कलिंग पर आक्रमण किया और उसपर अपना अधिपत्य जमाया। इस युद्ध में एक लाख से अधिक सैनिक मारे गए और कई लाख घायल हुये और बंदी बना लिये गए, यह युद्ध इतना भयावह था की इसके नरसंहार को देख अशोक का ह्रदय परिवर्तन हो गया और वह हिंसा छोड़ अहिंसा के मार्ग पर चल पड़ा। इस तरह कलिंग का युद्ध अशोक के जीवन का आखिरी युद्ध साबित हुआ।

मत हैं कि कलिंग युद्ध से आहात होकर सम्राट अशोक ने अपनी राज्य विस्तार की निति को बदल दिया और युद्ध व हिंसा को त्याग कर, बौद्ध धर्म को अपनाया और बौद्ध बनकर अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलकर देश-विदेश में बौद्ध धर्म का खूब प्रचार-प्रसार किया। बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिये अशोक ने अपने पुत्रपुत्री को कई देशों में भी भेजा। किन्तु कई मत ये भी हैं कि अशोक ने बौद्ध धर्म का अनुसरण तो किया लेकिन खुद कभी बौद्ध नहीं बना।

कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक ने धम्म की शुरुआत की कई विद्वानों का मत है कि अशोक ने एक नये धर्म की शुरुआत की थी लेकिन कईयों का  है कि सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को ही धम्म कहा है और उसकी प्रचार-प्रसार में अपनी सम्पूर्ण ज़िंदगी व्यतीत की। देखा जाये तो अशोक का धम्म और बौद्ध धर्म के नियम और उपदेश एक से जान पड़ते हैं। दोनों में ही जीव वध और हिंसा न करना, सबके साथ प्रेम से रहना, छोटे-बड़ों का आदर करना, दान-दया का अनुसरण करना आदि के बारे में ही लोगों को प्रेरित किया गया है।




बौद्ध ग्रन्थ दिव्यदान के अनुसार बौद्ध भिक्षु उपगुप्त ने अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी थी। सम्राट अशोक ने तीसरी बौद्ध संगीति (सभा) का भी आयोजन किया था।

सम्राट अशोक ने 84 स्तूपों का निर्माण करवाया था, जिन्हें बनने में 3 वर्ष का समय लगा था। किन्तु बौद्ध किवदन्तियों के अनुसार अशोक ने 4000 स्तूपों का निर्माण करवाया था। सम्राट अशोक ने कई स्तम्भों, शिलालेखों आदि का भी निर्माण करवाया था। उन्हीं में से एक है सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ जिसको हमारे राष्ट्रचिह्न के रूप में अपनाया गया है। जिसके शीर्ष पर चार सिंह बने हैं जो एक दूसरे से पीठ सटाए हुए हैं और उनमे से एक सिंह के निचे लिखा हुआ है ‘सत्यमेव जयते‘ जिसे राष्ट्रचिह्न में दर्शाया गया है। यह मौर्य कालीन स्थापत्य कला का अनुकरणीय उदाहरण है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार श्रीनगर का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था।

सम्राट अशोक का कभी न युद्ध करने की शपथ लेना और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपनी सब सम्पदा लुटाना ही कहीं न कहीं मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण बने। युद्ध न करने और अहिंसा मार्ग पर चलने के कारण सैन्य बल कमजोर हो गया जिस कारण मौर्य साम्राज्य की शक्ति क्षीण होती चली गयी। साथ ही यह भी सत्य है कि महान सम्राट अशोक के बाद उसका कोई भी उत्तराधिकारी इतना योग्य और शक्तिशाली नहीं था जोकि मौर्य साम्राज्य को संभाल सके। फलतः अशोक की मृत्यु के पचास वर्ष के भीतर ही उसका विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया।

मौर्य साम्राज्य का अंतिम शासक बृहद्रथ था, जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की और मौर्य सिंहासन पर कब्ज़ा किया। पुष्यमित्र शुंग ही था जिसने शुंग वंश की नींव रखी, मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही शुंग वंश के विशाल साम्राज्य का उदय हुआ।

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