मोहम्मद बिन तुगलक कौन था - उपलब्धियां, प्रशासनिक व्यवस्था, योजनाएं

मोहम्मद बिन तुगलक कौन था – उपलब्धियां, प्रशासनिक व्यवस्था, योजनाएं

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मोहम्मद बिन तुगलक कौन थे

मोहम्मद बिन तुगलक ( Muhammad Bin Tughlaq ) दिल्ली की सल्तनत का प्रथम तुगलक वंश का शासक माना जाता है। 1320 ईस्वी में, गयासुद्दीन तुगलक को दिल्ली का सुल्तान घोषित करने के बाद मोहम्मद बिन तुगलक को उलूग खां की उपाधि दी गई थी। 1325 ईस्वी में गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन तुगलक को दिल्ली का सिंहासन प्राप्त हुआ जिसके बाद उसने स्वयं को खलीफा ( विश्व का सेनापति ) की उपाधि दी। मोहम्मद बिन तुगलक ने दक्षिण भारत के दुर्गम क्षेत्रों में राजनीतिक एकता को स्थापित कर प्रत्यक्ष रूप से शासन करने का कार्य किया था। मोहम्मद बिन तुगलक वह पहले सुल्तान थे जिसने दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तरी भारत में भी मुख्य रूप से शासन किया था। कहा जाता है कि तुगलक ने अपने शासनकाल में कई प्रकार के प्रशासनिक कार्य भी किए थे। मोहम्मद बिन तुगलक दिल्ली के सल्तनत का प्रथम शासक था जिसने सभी धर्मों के प्रति समानता को सम्मान प्रदान किया था।

मोहम्मद बिन तुगलक का वास्तविक नाम क्या था

मोहम्मद बिन तुगलक का वास्तविक नाम मालिक फखरुद्दीन मोहम्मद जूना खां था। वह गाजी मलिक उर्फ़ गयासुद्दीन के पुत्र थे जो पश्चिमी सीमा क्षेत्र के रक्षक थे। मोहम्मद बिन तुगलक के पिता बचपन से ही सैनिक योग्यता की शिक्षा दिया करते थे जिसके कारण मोहम्मद बिन तुगलक में सैन्य योग्यता थी। माना जाता है कि मोहम्मद बिन तुगलक का शासनकाल 1325-1351 ईसवी तक रहा।

मुहम्मद बिन तुगलक राजधानी परिवर्तन

मोहम्मद बिन तुगलक का मानना था कि दक्कन के अधिकांश क्षेत्रों में दिल्ली से शासन करना मुश्किल है इसीलिए उसने राजधानी परिवर्तन करने का निर्णय लिया। मोहम्मद तुगलक ने दक्कन के पुणे में स्थित दौलताबाद को अपनी नई राजधानी बनाई जिसके बाद उसने दिल्ली की समस्त जनता को दौलताबाद में स्थानांतरण करने का आदेश दिया। माना जाता है कि दिल्ली के अधिकांश नागरिकों को दौलताबाद में बलपूर्वक लाया गया था जिसके कारण वहां आने के पश्चात विकलांग एवं बीमार लोगों की मृत्यु भी हुई। इसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक को यह प्रतीत हुआ कि उसके द्वारा किया गया राजधानी परिवर्तन नागरिकों के दृष्टिकोण से उचित नहीं है और उसने सभी लोगों को दिल्ली वापस जाने की अनुमति प्रदान की। मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा किए जाने वाले राजधानी परिवर्तन के कारण दिल्ली की जनता के बीच एक नई आपदा को जन्म दिया था।

मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा किए जाने वाले राजधानी परिवर्तन की योजना सुनियोजित थी। सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन करने हेतु कई प्रकार के प्रबंध किए थे जैसे कुएं का निर्माण, रहने के लिए आवास आदि। परंतु इसके बाद भी वह नागरिकों को संतुष्ट नहीं कर सका जिसके कारण उसे पुनः दिल्ली लौटने का आदेश जारी करना पड़ा। इस प्रकार मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा किए जाने वाले राजधानी परिवर्तन की योजना असफल रही।

मुहम्मद बिन तुगलक की उपलब्धियां

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने 26 वर्षों के शासन काल में कई प्रकार की योजनाओं को सामाजिक रूप से स्थापित करने का कार्य किया था। वह एक बुद्धिमान शासक होने के साथ-साथ गणित एवं विज्ञान के विषयों की भी पूर्ण जानकारी रखता था। माना जाता है कि सम्राट अशोक के शासनकाल के बाद मोहम्मद बिन तुगलक पहला मुस्लिम सम्राट था जिसने पूरे भारत में राजनीतिक एवं प्रशासनिक एकता को बढ़ावा देने का प्रयास किया था। मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने शासनकाल में कुलीन वर्ग के एकाधिकारों को समाप्त करके केवल योग्यता के आधार पर पदाधिकारियों की नियुक्ति करने का कार्य किया। इसके अलावा उसने न्याय प्रणाली में भी बदलाव करके वर्ग विशेष के एकाधिकारों को समाप्त किया था।

मुहम्मद बिन तुगलक की प्रशासनिक व्यवस्था

मोहम्मद बिन तुगलक ने प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार करने हेतु कई प्रकार की योजनाओं का निर्माण किया जिसमें राजस्व सुधार, सार्वजनिक सुधार, धार्मिक कार्य, निर्माण कार्य आदि कार्य शामिल थे।

राजस्व सुधार कार्य

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी सत्ता को स्थापित करने के पश्चात जनता को प्रोत्साहित करने हेतु राजस्व में अनेकों सुधार कार्य किए। उन्होंने अपने शासनकाल में कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए नहर, कुएं एवं बागों का निर्माण किया।

सार्वजनिक सुधार कार्य

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने कार्यकाल में जनता की सुविधा हेतु सड़कों, पुलों एवं भवनों का निर्माण कराया। इसके अलावा सम्राट ने सल्तनत काल में डाक व्यवस्था को भी दुरुस्त करने का कार्य किया जिससे नागरिकों को सुविधा हुई।

धार्मिक कार्य

माना जाता है कि मोहम्मद बिन तुगलक एक कट्टर सुन्नी मुसलमान थे इसके बावजूद वह अन्य धर्मों के सिद्धांतों का सावधानीपूर्वक निर्वाहन किया करते थे। केवल इतना ही नहीं उन्होंने अपने शासनकाल में इस्लाम के नियमों का पूर्णतः पालन करने का दबाव भी बनाया था। मोहम्मद बिन तुगलक अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति को अपनाते थे।

निर्माण कार्य

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया कि मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने साम्राज्य में कई भवनों, सड़कों, नहर, कुएं आदि का निर्माण कराया था। इसके अलावा वे सत्यापन कला के क्षेत्र में भी विशेष रूचि रखते थे जिसके लिए उन्होंने तुगलकाबाद नामक एक दुर्ग की भी नींव रखी थी।

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएं

मोहम्मद बिन तुगलक ने शासन व्यवस्था को संगठित करने हेतु अपने कार्यकाल में कई प्रकार की योजना को लागू किया था जो कुछ इस प्रकार हैं:-

  • दोआब में कर वृद्धि
  • राजस्व में सुधार
  • कृषि की पुनः स्थापना

दोआब में कर वृद्धि

मोहम्मद बिन तुगलक ने दोआब में अत्यधिक कर लगाया था जिसके कारण वहां की क्षेत्रीय जनता सुल्तान के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन करते थे। दोआब उन क्षेत्रों को कहा जाता है जो गंगा एवं जमुना के बीच स्थित होते हैं। मोहम्मद बिन तुगलक के अनुसार दोआब के कृषि क्षेत्रों में अधिक मात्रा में फसल का उत्पादन हुआ करता था जिसके कारण सम्राट ने इस क्षेत्र में कर वृद्धि की थी। परंतु सम्राट ने यह कर उस समय लगाया जब दोआब के अधिकांश किसान अकाल सूखा एवं बाढ़ की समस्याओं से जूझ रहे थे। मोहम्मद बिन तुगलक के इस निर्णय के कारण कई किसानों ने सत्ताधिकारियों को मार डाला जिसके कारण सुल्तान को काफी हानि हुई।

राजस्व में सुधार

मध्यकालीन युग में भू-राजस्व ही एकमात्र राज्य की आय का स्रोत था। मोहम्मद बिन तुगलक ने इसमें सुधार करने हेतु कई प्रांतीय सूबेदारों एवं कोषाध्यक्षों को आदेश दिया कि वह प्रांतीय आय व्यय से संबंधित लेखा जोखा का कार्य करें एवं आय व्यय की सूचनाएं नियमित रूप से सुल्तान के पास भेजने का कार्य करें। सुल्तान के इस निर्णय के कारण आय व्यय कि सभी जांचे कड़ाई से की जाती थी। मोहम्मद बिन तुगलक ने राजस्व में सुधार करने के उद्देश्य से इसका निरीक्षण करने के लिए सत्ताधिकारियों की नियुक्ति भी की थी।

कृषि की पुनः स्थापना

1326-1341 ई में मोहम्मद बिन तुगलक के साम्राज्य में कई बार अकाल, सूखा एवं बाढ़ की स्थिति बनी रही जिसके कारण फसल को भारी मात्रा में नुकसान पहुंचा। मोहम्मद बिन तुगलक ने कृषि से संबंधित सभी योजनाओं को पूर्ण रुप से लागू करने के कई प्रयास किए परंतु वह असफल रहे। सम्राट ने कृषि को पुनः स्थापित करने के हेतु भूमि को दो भागों में विभाजित किया था जिसमें पहला भाग पूर्ण रूप से बंजर था एवं दूसरा खेती के योग्य था। सम्राट ने भूमि के बंजर वाले भाग को उपजाऊ बनाने हेतु कई प्रयास किए परंतु वह विफल रहे।

मुहम्मद बिन तुगलक की असफलता के कारण

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने शासनकाल में कई योजनाओं को लागू करने का प्रयास किया परंतु वह उन सभी योजनाओं को एक व्यवहारिक रूप से लागू नहीं कर सका जिसके कारण उसके द्वारा प्रतिपादित की जाने वाली लगभग सभी योजनाएं असफल रही। मोहम्मद बिन तुगलक की असफलता के कई कारण हैं जो कुछ इस प्रकार है:-

  • संयम एवं दूरदर्शिता का अभाव
  • अनुचित समय पर कर वृद्धि
  • राजधानी परिवर्तन
  • सांकेतिक मुद्रा
  • खुरासान विजय की योजना
  • जिद्दी एवं अभिमानी स्वभाव
  • उलेमा वर्ग का विरोध
  • निर्दई एवं रक्त पिपासु
  • नियंत्रण का अभाव

संयम एवं दूरदर्शिता का अभाव

माना जाता है कि मोहम्मद बिन तुगलक में संयम का अभाव था जिसके कारण वह किसी भी विपरीत परिस्थिति में संयम को बनाए रखने में असमर्थ था। इसके अलावा मोहम्मद बिन तुगलक में दूरदर्शिता का भी अभाव था क्योंकि वह बिना विचार विमर्श किए ही अपनी नीतियों का निर्माण किया करता था जिसके कारण उसके द्वारा बनाई गई अधिकांश नीति विफल रही।

अनुचित समय पर कर वृद्धि

मोहम्मद बिन तुगलक ने दोआब में उस दौरान कर वृद्धि की थी जब वहां के किसानों को खेती करने में कई अन्य प्रकार के समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इसी कारण सम्राट की कथित रूप से आलोचना भी की गई। अनुचित समय पर कर वृद्धि होने के कारण किसानों की स्थिति और अधिक खराब हो गई थी जिसके कारण उन्होंने चोरी, डकैती एवं हत्याएं जैसी वारदातों को अंजाम दिया।

राजधानी परिवर्तन

मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा किए जाने वाले राजधानी परिवर्तन के कारण दिल्ली की जनता को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा जिसके लिए स्वयं सम्राट ही जिम्मेदार थे। उन्होंने राजधानी परिवर्तन का निर्णय विचार विमर्श के बिना ही ले लिया था जिसके कारण उनकी यह योजना भी विफल रही।

सांकेतिक मुद्रा

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने शासनकाल में मुद्रा के क्षेत्र से संबंधित कई सुधार करने के प्रयास किए जो असफल रहे। सम्राट ने नई मुद्रा ‘दोकनी’ का प्रचलन किया जो तांबे एवं कांसे से बनाए गए थे। सम्राट इस मुद्रा को सोने एवं चांदी की कीमतों के योग्य बनाना चाहते थे जिसमें वह असफल रहे। इसके अलावा मोहम्मद बिन तुगलक ने सांकेतिक मुद्रा को लागू करने की व्यवस्था को भी दुरुस्त नहीं किया जिसके कारण इस मुद्रा को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सका।

खुरासान विजय की योजना

मोहम्मद बिन तुगलक ने खुरासान विजय की योजना का निर्माण किया जो पूर्ण रूप से विफल रही। इस योजना में लगभग तीन लाख से अधिक सैनिकों को नगद राशि प्रदान की गई जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ा। केवल इतना ही नहीं इस योजना के माध्यम से कई लड़ाकू जातियां आपस में मिल गई थी जिसके कारण सैन्य शक्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई।

जिद्दी एवं अभिमानी स्वभाव

कई इतिहासकारों के अनुसार मोहम्मद बिन तुगलक स्वभाव से बेहद जिद्दी एवं अभिमानी व्यक्ति थे जो किसी भी योजना को लागू करने से पूर्व उच्चाधिकारियों की सलाह नहीं लिया करते थे। उनके इस व्यक्तित्व के कारण उनकी सभी योजनाएं प्रशासनिक कार्यों में असफल रहीं।

उलेमा वर्ग का विरोध

माना जाता है कि उलेमा वर्ग के लोग मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा बनाई गई योजना को सफल बनाने में कोई सहयोग नहीं किया करते थे। वह सुल्तान के सहिष्णुता, उदारता एवं स्वतंत्र विचारों का मुख्य रूप से विरोध किया करते थे। इसके अलावा मोहम्मद बिन तुगलक उलेमा वर्ग के लोगों के साथ साधारण लोगों जैसा व्यवहार करते थे जो उन्हें पसंद नहीं था।

निर्दयी एवं रक्त पिपासु

मोहम्मद बिन तुगलक की शासन प्रणाली के अंतर्गत नागरिकों को छोटे-मोटे अपराधों के लिए भयंकर दंड देने का प्रावधान किया गया था जिसके कारण नागरिक उनके द्वारा बनाई गई नीतियों का विद्रोह किया करते थे। इसके अलावा वे अपराधियों को हाथी के पैरों तले कुचलवा देते थे जिसके कारण लोग उन्हें रक्त पिपासु के नाम से भी पुकारा करते थे।

नियंत्रण का अभाव

मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा बनाई गई अधिकांश योजनाएं केवल इसीलिए विफल रही क्योंकि उनकी योजनाएं भ्रष्टाचार एवं लापरवाही को बढ़ावा देने का कार्य करती थी। सम्राट की योजनाएं देश के उत्तम भविष्य के दृष्टिकोण से उचित नहीं थी जिसके कारण उनकी योजनाएं असफल रही।

पढ़ें – भारत के संविधान के अंतर्गत लोकतंत्र की परिभाषा

मुहम्मद बिन तुगलक ने सांकेतिक मुद्रा कब लागू की थी

मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने सभी योजनाओं को पूरा करने हेतु 1330 ई में सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन किया। उन्होंने सांकेतिक मुद्रा को चांदी के टंके के बराबर घोषित कर दिया था जिसके कारण मुद्रा की कीमतों में गिरावट आई। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार सांकेतिक मुद्रा को तांबे या कांसे द्वारा बनाया गया था जो चांदी की बराबरी नहीं कर सकता था।

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