उत्तराखंड में पंचायती राज प्रणाली

उत्तराखंड में पंचायती राज प्रणाली

उत्तराखंड में पंचायती राज प्रणाली : उत्तराखण्ड राज्य में पंचायती राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) सर्वप्रथम 15 अगस्त 1947 को लागू किया गया। 1961 से इस व्यवस्था को त्रिस्तरीय (Tier) रूप में लागू किया गया। 22 अप्रैल 1994 को इसे संवैधानिक निकाय (Statutory body)के रूप में 73 वें संविधान संशोधन (73th Amendment) के अनुक्रम (Sequence) में उत्तर प्रदेश पंचायती विधि विधेयक 1994 (Uttar Pradesh Panchayati Law Bill 1994) के तहत लागू किया गया।

राज्य के गठन के बाद 2002-03 में प्रथम निर्वाचित सरकार ने पूर्व व्यवस्था को थोड़ी-बहुत परिवर्तन के साथ यथावत (Unchanged) बनाए रखने का निर्णय (Decision) लिया।

राज्य सरकार ने पंचायतीराज संस्थाओं के सुदढीकरण  एवं विकास कार्यों के प्रभावी अनुश्रवण (Effective monitoring) हेतु पंचायती राज निदेशालय (PRI directorate) एवं जिला पंचायत अनुश्रवण प्रकोष्ठ (District Panchayat Monitoring Cell) का गठन किया है।

मार्च 2008 में पारित पंचायती अधिनियम (Panchayati Act) के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण 33% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया।

जिला पंचायत (District Panchayat)

पंचायती राज व्यवस्था का सबसे शीर्ष (The Top) निकाय है I यह एक निगमित निकाय है।इसके सदस्यों का चुनाव जिले के व्यस्क जनता द्वारा किया जाता है।

जिला पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव पंचायत के सदस्यों द्वारा किया जाता है। जिले के सभी प्रमुख (All of the district chief), लोकसभा सदस्य (Lok Sabha Members), राज्यसभा सदस्य (Rajy Sabha Members), राज्य विधानसभा सदस्य (State Assembly member), जिला पंचायत की कार्यवाही (Proceedings) में भाग ले सकते है व मत दे सकते हैं। केवल अविश्वास प्रस्ताव (No confidence Motion) के समय मत नहीं दे सकते है।

इसका सचिव जिले का मुख्य विकास अधिकारी/पंचायती (Chief Development Officer) राज अधिकारी होता है।

जिला पंचायत अपने सदस्यों में से 6 प्रकार की समितियां बनाती हैं, जो इस प्रकार है :-

  1. नियोजन एवं विकास समिति (Planning and Development Committee)
  2. शिक्षा समिति (Education Committee)
  3. स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समिति (Health and Sanitation Committee)
  4. प्रशासनिक समिति (The Administrative Committee)
  5. पेयजल समिति (Drinking Water Committee)
  6. निर्माण कार्य समिति (Construction Committee)

क्षेत्र पंचायत (Panchayat area/Kshetr Panchayat)

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में क्षेत्र पंचायत मध्य स्तरीय निकाय (Middle level body) है। इसके अध्यक्ष को प्रमुख (Chief) तथा उपाध्यक्ष को उपप्रमुख (Deputy) कहा जाता है। इसके अलावा एक- कनिष्ठ उप प्रमुख (Junior deputy head) भी होता है।

क्षेत्र पंचायत के सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के वयस्क मतदाता करते हैI क्षेत्र पंचायत के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 20 से 40 तक हो सकती है।

क्षेत्र पंचायत के अंतर्गत आने वाली ग्राम प्रधान (Gram Prdhan), लोकसभा सदस्य (Lok Sabha Member /MP), राज्यसभा सदस्य (Rajy Sabha Member/MP), राज्य विधानसभा सदस्य (State Assembly member), क्षेत्र पंचायत (Panchayat area) की बैठकों में भाग ले सकते है, और प्रस्तावों पर मत दे सकते है। केवल प्रमुख या उपप्रमुख के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का मत नहीं दे सकते हैं।

  • क्षेत्र पंचायत का सचिव बी.डि.ओ. (B.D.O.) होता है।

ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)

त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था में सबसे निम्न स्तर (Low Levels) का ग्राम पंचायत होता है। किसी भी ग्राम पंचायत के सदस्यों की संख्या 5 से कम वह 15 से अधिक नहीं हो सकती है। ग्राम पंचायत सदस्य एवं पंचायत अध्यक्ष का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा की जाती है। ग्रामसभा द्वारा एक उपप्रधान (Deputy Prime) भी चुना जाता है।

एक अथवा अधिक गांवों को मिलाकर गठित ग्राम पंचायत के तहत पंजीकृत मतदाताओं (Registered voters) को मिलाकर जो सभा बनती है उसे ग्रामसभा कहते है। एक ग्रामसभा की एक ही ग्राम पंचायत होती है।

ग्राम पंचायतों के सब अभिलेख (Sub- Record) ग्राम प्रधान (Head of Village/ Gram Pradhan) के पास होते है, तथा सचिव की नियुक्ति ग्राम पंचायत द्वारा की जाती है।

नगर निकाय प्रणाली (Municipal Systems)

राज्य में नगरीय स्वायत्त शासन प्रणाली (Urban Self-Government System) की शुरुआत 1916 में हुई।

1993 में 74वें संविधान संशोधन (74th Amendment) द्वारा निकायों को संवैधानिक दर्जा (Constitutional status) दिया गया। 1994 में इन निकायों के लिए नया अधिनियम (Act) पास किया गया। राज्य गठन के बाद नए स्वायत्त शासन (Self-Government) थोड़ी-बहुत संसोधन के साथ पूर्ववत कानून के अनुसार चल रहे है।

प्रदेश में त्रिस्तरीय स्वायत्त शासन की व्यवस्था है, जो इस प्रकार है:-

नगर निगम (Municipal Corporation)

संसोधित नियम के अनुसार राज्य में नगर परिषद (City Council) का गठन उन नगरों में किया जाती है, जिनकी जनसंख्या एक लाख या अधिक होती है।

नगर निगमों की रचना एक नगर प्रमुख (मेयर) (Mayor) और सभासदों (Councillors) से होती है। नगर प्रमुख और सभासदों का चुनाव प्रत्यक्ष रीति से होता है।

राज्य के देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, काशीपुर, रुद्रपुर रुड़की नगर निगमों में आते हैं।

नगर पालिका परिषद (Municipal Council)

जिन नगरों की जनसंख्या (Population) 50,000 से 1,00,000 तक होती है। वहां नगर पालिका परिषद की रचना की जाती है। राज्य में कुल 38 नगर पालिका परिषद है।

नगर पंचायत (Nagar Panchayat)

जिन नगरों/कस्बों की जनसंख्या 5,000 से 50,000 तक होती है, वहां नगर पंचायतों का गठन किया जाता है। राज्य में कुल 38 नगर पंचायतें है, जिसमें से 3 नगर पंचायतों बद्रीनाथ, केदारनाथ तथा गंगोत्री में चुनाव नहीं होते, बल्कि मनोनीत पंचायतें (Designated Panchayats) हैं।

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