रूसो कौन था - रूसो के शैक्षिक विचार, रूसो का शिक्षा दर्शन

रूसो कौन था – रूसो के शैक्षिक विचार, रूसो का शिक्षा दर्शन

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रूसो कौन था

रूसो एक प्रसिद्ध दार्शनिक, संगीतकार एवं लेखक थे जिनका जन्म 28 जून 1712 में स्विट्जरलैंड के जिनेवा नामक शहर में हुआ था। रूसो का पूरा नाम जॉ जाक रूसो (Jean-Jacques Rousseau) है। रूसो को एक प्रसिद्ध प्रकृतिवादी दार्शनिक के रूप में भी जाना जाता है। उनका जन्म जिनेवा नामक नगर के एक सम्मानित परिवार में हुआ था। रूसो के पिता फ्रांस में घड़ियां बनाने का काम किया करते थे। रूसो के जन्म के तुरंत बाद ही उनकी माता का निधन हो गया था जिसके बाद उनकी देखरेख उनकी चाची ने की। रूसो ने बेहद कम उम्र में ही घर छोड़ दिया था जिसके बाद उन्होंने छोटी-मोटी नौकरी करके अपना गुजर-बसर किया था।

सन 1750 में रूसो ने सर्वप्रथम एक निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लिया जिसके बाद उन्हें कला एवं विज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रसिद्धि हासिल हुई। इसके तीन वर्ष बाद उन्होंने डिजान नामक संस्था में आयोजित निबंध लेखन प्रतियोगिता में दोबारा भाग लिया जिससे संपूर्ण यूरोप में इन्हें प्रसिद्धि हासिल हुई। रूसो ने अपने जीवन काल में कई क्रांतिकारी आंदोलनों को संचालित किया था जिसके कारण इन्हें फ्रांस की जनता बेहद पसंद करती थी। रूसो के विषय में नेपोलियन ने एक बार कहा था कि रूसो के बिना फ्रांस की क्रांति संभव नहीं थी। रूसो एक दार्शनिक के साथ-साथ एक महान क्रांतिकारी भी थे जिसके कारण उनका गौरव पूरे फ्रांस में विख्यात था।

रूसो के शैक्षिक विचार

रूसो तत्कालीन शिक्षा पद्धति का विरोध करते थे क्योंकि उनका मानना था कि विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा उनके जीवन से किसी भी प्रकार से संबंधित नहीं है। वह इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली को निरर्थक मानते थे। रूसो की विचारधारा के अनुसार शिक्षा एक ऐसी प्रणाली होती है जो विद्यार्थियों को सामाजिक ज्ञान देने के बजाय प्रकृति का अर्थ भी विस्तारित कर सके। रूसो शिक्षा पद्धति को मूल रूप से प्रकृति का अनुसरण करने हेतु आवश्यक मानते थे जिसके लिए उन्होंने ‘प्रकृति की ओर लौटो’ का नारा भी दिया था। रूसो के अनुसार एक विद्यार्थी अपनी योग्यता प्रकृति के अनुरूप व्यवस्थित कर सकता है।

रूसो का शिक्षा दर्शन

विश्व के इतिहास में रूसो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक शिक्षा पर जोर दिया था। उनका मानना था कि विद्यार्थियों को स्वतंत्रता का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है जिसके कारण वह भविष्य में इसका सही उपयोग कर सकें। रूसो के अनुसार कोई भी विद्यार्थी सामान्य विद्यार्थी नहीं होता बल्कि वह एक विशेष विद्यार्थी होता है। रूसो कहते थे कि समाज में दो प्रकार की शिक्षा व्यवस्था होती है पहला सार्वजनिक शिक्षा एवं दूसरा घरेलू शिक्षा। सार्वजनिक शिक्षा के अंतर्गत शिक्षा प्रणाली का संचालन सरकार द्वारा किया जाता है जो एक विद्यार्थी को समाज के मूल अधिकारों के विषय पर ज्ञान देता है एवं घरेलू शिक्षा वह होती है जो घरों या निजी विद्यालयों द्वारा संचालित किए जाते हैं जिसमें विद्यार्थी को समाज के साथ-साथ अन्य सभी प्रकार के ज्ञान भी प्राप्त करने के अवसर प्रदान होते हैं।

रूसो का शिक्षा दर्शन की विशेषता

रूसो के अनुसार शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों की स्वाभाविक शक्तियों का आंतरिक रूप से विकास करने का कार्य करती है। यह एक ऐसी प्रणाली है जो बालकों की मूल प्रवृत्ति का विकास करके उन्हें जीवन का सही अर्थ समझाती है। रूसो कहते थे कि बच्चों का विकास प्रकृति एवं पदार्थ के माध्यम से होना चाहिए जिससे बच्चों की स्वभाविक शिक्षा प्रभावित हो सके। रूसो के अनुसार तत्कालीन शिक्षा पद्धति के कारण बच्चों में सद्गुणों का विकास सही ढंग से नहीं हो पाता जिसके कारण वे इसका विरोध भी किया करते थे। उनका मानना था कि बालक के माता-पिता स्वयं शिक्षा के क्षेत्र में अधिक सहजता से बालकों को विकसित कर सकते हैं।

रूसो ने किस सिद्धांत का प्रतिपादन किया

रूसो ने मुख्य रूप से लोकप्रिय प्रभुसत्ता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। रूसो के अनुसार प्रभुसत्ता का हर कार्य सभी व्यक्तियों के लिए सामान्य रूप से हितकारी होता है। प्रभुसत्ता मुख्य रूप से जनता की विचारधाराओं में निहित होता है। रूसो का मानना था कि प्रभुसत्ता का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता। प्रभुसत्ता एक ऐसी नीति है जो विधानपालिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका की कार्यप्रणाली का केंद्र माना जाता है। रूसो के अनुसार लोकप्रिय प्रभुसत्ता के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति अपने प्राकृतिक अधिकारों को सामूहिक अस्तित्व के प्रति समर्पित कर देता है जिसके परिणाम स्वरूप प्रभुसत्ता की नीतियां संपूर्ण होती हैं। रूसो कहते थे कि प्रभुसत्ता समाज में एकता को स्थापित करने का एकमात्र सूत्र है क्योंकि प्रभुसत्ता सदैव न्यायशील प्रकृति की होती है।

रूसो के राजनीतिक विचार

रूसो के विचारों को राजनीतिक क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। रूसो ने सामाजिक समझौते का सिद्धांत एवं सामान्य इच्छा के सिद्धांत के द्वारा राजनीतिक क्षेत्र में प्रसिद्धि हासिल की थी। रूसो ने अपनी विचारधाराओं के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में कई परिवर्तन किए जिसके कारण उन्हें राजनीति के प्रसिद्ध दार्शनिक के रूप में भी देखा जाता है। रूसो ने अपने राजनीतिक विचारों को कई भागों में विभाजित किया है जो कुछ इस प्रकार है:-

  • राजतंत्र
  • प्रजातंत्र
  • कुलीन तंत्र
  • मिश्रित शासन व्यवस्था

राजतंत्र

राजतंत्र वह शासन व्यवस्था है जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति के द्वारा शासन का संचालन किया जाता है। यह विश्व की सबसे प्राचीन एवं स्वाभाविक शासन प्रणाली है जिसमें किसी एक वंश या परिवार के लोगों द्वारा शासन किया जाता है। यह शासन प्रणाली आमतौर पर किसी राजा के द्वारा संचालित किया जाता है।

प्रजातंत्र

प्रजातंत्र वह शासन प्रणाली है जिसके अंतर्गत सभी नागरिकों को समान रूप से अधिकार प्राप्त होते हैं। इसमें सामाजिक एवं आर्थिक न्याय के साथ-साथ राजनीतिक न्याय की व्यवस्था भी की जाती है। प्रजातंत्र मुख्य रूप से नागरिकों को सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता प्रदान करने का कार्य करती है।

कुलीन तंत्र

कुलीन तंत्र वह शासन व्यवस्था है जिसमें एक देश या राज्य की शासन प्रणाली समाज के उच्च कुल के लोगों द्वारा संचालित किया जाता है। यह शक्तिशाली लोगों का एक समूह होता है जो कुशलतापूर्वक राजनीति के क्षेत्र में अपने द्वारा बनाए गए नीतियों का निर्वहन करते हैं। इस प्रकार की शासन व्यवस्था में आमतौर पर किसी विशेष वर्ग के लोगों द्वारा शासन किया जाता है।

मिश्रित शासन व्यवस्था

मिश्रित शासन व्यवस्था वह व्यवस्था होती है जिसके अंतर्गत कई प्रकार की योजनाओं का मिश्रण होता है। मिश्रित शासन व्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से राज्य अर्थव्यवस्था के निर्देशों का पालन करती है जिसमें सार्वजनिक स्वामित्व एवं निजी स्वामित्व का मिश्रण होता है।

रूसो के पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन में योगदान

रूसो एक प्रसिद्ध दार्शनिक होने के साथ-साथ एक राजनीतिक विशेषज्ञ भी थे जिन्होंने राजनीतिक चिंतन में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था। पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन पूर्ण रूप से राज्य एवं नगर पर आधारित होता है। रूसो के अनुसार समाजवाद, निरंकुशवाद, लोकतंत्र एवं व्यक्तिवाद राजनीति का एक अहम हिस्सा है जिसका उल्लेख उन्होंने अपने द्वारा लिखे गए ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ नामक रचना में किया है। रूसो का मानना था कि एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए प्रत्येक नागरिक को राज्य की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेना अत्यंत आवश्यक होता है।

रूसो के अनुसार शिक्षा की परिभाषा

रूसो का मानना था कि सच्ची शिक्षा वह होती है जो एक विद्यार्थी की मूल प्रवृत्ति का विकास करती है। शिक्षा का कार्य केवल निर्देश देना या ज्ञान को संचय करना ही नहीं होता बल्कि बालकों की स्वभाविक शक्तियों का आंतरिक रूप से विकास करना भी होता है। रूसो ने अपनी विचारधाराओं द्वारा सामाजिक शिक्षा की तुलना में प्राकृतिक शिक्षा को प्राथमिकता दी है। वे कहते थे कि एक विद्यार्थी को शिक्षा देने से पूर्व प्रकृति के स्वभाव को समझना बेहद अनिवार्य है। उनके अनुसार मनुष्य का निर्माण सामाजिक शिक्षा के बजाय प्राकृतिक शिक्षा के द्वारा ही होना चाहिए। रूसो के अनुसार मनुष्य को सामाजिक बंधनों के अनुसार नहीं अपितु अपने स्वभाव के अनुसार चलना चाहिए।

रूसो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य

रूसो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को प्रकृति के प्रति ज्ञान एवं जागरूक करना होता है। शिक्षा के माध्यम से मानवों को प्रकृति के अनुरूप जीवन व्यतीत करने की योग्यता मिलती है। रूसो के कथनानुसार एक कमजोर शरीर कमजोर मस्तिष्क का निर्माण करता है जिससे व्यक्ति के व्यक्तित्व पर नकारात्मक रूप से प्रभाव पड़ता है।

रूसो ने किस बात पर अधिक बल दिया

रूसो कहते थे कि एक आदर्श समाज की स्थापना हेतु जनता में शक्तियों का होना बेहद जरूरी है। रूसो ने अपने जीवन काल में शिक्षा के स्तर पर जोर देने के साथ-साथ स्वतंत्रता, लोकतंत्र एवं समानता के भाव का भी भरपूर समर्थन किया। रूसो के अनुसार अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान के विकास के कारण मनुष्य का नैतिक पतन हुआ है जिसके कारण वह एक संतुष्ट जीवन का अनुभव नहीं कर पाता। इसके अलावा रूसो ने इस धारणा पर भी बल दिया कि मनुष्य की गरीबी ईश्वरीय न्याय नहीं है। रूसो ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इस धारणा को जनता के बीच फैलाने का प्रयास किया एवं गरीबों को यह बताया कि उन्हें गरीबी के कारण समाज में शर्मिंदा होने की आवश्यकता नहीं है।

असमानता पर रूसो के विचार

रूसा को आधुनिक युग का एक महान विचारक माना जाता था क्योंकि उन्होंने शिक्षा, राजनीति, मानव के स्वभाव, राज्य की उत्पत्ति, प्राकृतिक अवस्था, सामाजिक असमानता आदि के क्षेत्रों में अपने विचार रखे थे। रूसो के अनुसार आधुनिक सभ्यता के कारण समाज में असमानता की स्थिति का जन्म हुआ था। उनका मानना था कि एक राज्य के निर्माण के बाद नागरिकों का मानसिक विकास होता है जिसके कारण वे नैतिकता एवं अनैतिकता के मध्य अंतर करने लगा और इसी के कारण प्राकृतिक अवस्था के दृष्टिकोण से आधुनिक सभ्यता सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई। इस कारण समाज में समानता के स्तर में कमी हुई। रूसो के अनुसार समाज में फैली असमानता का अंत करने के लिए राज्य को पहल करनी चाहिए। एक आदर्श राज्य का कर्तव्य होता है कि वह राज्य में असमानताओं को खत्म करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहे।

स्वतंत्रता और समानता पर रूसो के विचार

रूसो ने स्वतंत्रता एवं समानता पर अपने विचारों को कई प्रकार से व्यक्त किया है। रूसो के अनुसार व्यक्ति के विकास में स्वतंत्रता की बेहद अहम भूमिका होती है। रूसो का मानना था कि मनुष्य की स्वतंत्रता कोई प्राकृतिक अधिकार नहीं है बल्कि वह एक ऐसा अधिकार है जो राज्य द्वारा संपादित किया जाता है। हर नागरिक को स्वतंत्रता हेतु सामान्य इच्छा के नीति व नियमों का पालन करना बेहद आवश्यक है।

रूसो समाज में समानता के अधिकार को स्थापित करना बेहद अनिवार्य समझते थे। उनका मानना था कि राज्य में फैली असमानता का अंत करने के लिए राज्य को अहम भूमिका निभानी चाहिए। किसी भी व्यक्ति द्वारा अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करके राज्य को विकसित नहीं किया जा सकता। रूसो नैतिकता के साधनों का उपयोग करके व्यक्ति का सामाजिक व आर्थिक रूप से विकास करने की प्रक्रिया का समर्थन करते थे। रूसो कहते थे कि असमानता को खत्म करने हेतु हर व्यक्ति को सामान्य इच्छा के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।

सामान्य इच्छा पर रूसो के विचारों की विवेचना कीजिए

रूसो ने सामान्य इच्छा सिद्धांत का वर्णन अपने द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ ने किया था। उन्होंने इस पुस्तक के माध्यम से एक आदर्श समाज की स्थापना को विस्तृत करने का प्रयास किया जिससे व्यक्ति को प्राकृतिक अवस्था की समस्या से छुटकारा मिल सके। उन्होंने सामान्य इच्छा के सिद्धांत के द्वारा एक आदर्श समाज की विशेषताओं को समझाने का प्रयास किया था जिसका एकमात्र उद्देश्य मानव जाति के कष्टों का अंत करना था। इसके अलावा रूसो ने स्वतंत्रता के भाव को प्रत्येक व्यक्ति के बीच प्रवाहित करने का भी प्रयास किया जिससे व्यक्ति एक आदर्श समाज की स्थापना कर सके। रूसो द्वारा दिए गए समान इच्छा के सिद्धांत की प्रमुख विशेषता यह थी कि इस सिद्धांत के द्वारा एक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित कर सकता है एवं प्रत्येक व्यक्ति अपने प्राकृतिक अधिकारों को सामूहिक अस्तित्व को समर्पित कर सकता है।

रूसो द्वारा दिए गए सामान्य इच्छा के सिद्धांत को राजनीतिक क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। राजनीतिक विचारकों के अनुसार यह सिद्धांत दो प्रकार से लागू होता है पहला यथार्थ एवं दूसरा आदर्श। यथार्थ इच्छा व्यक्तिगत एवं स्वार्थ पूर्ण होती है जो रूसो के दृष्टिकोण से उचित है एवं आदर्श इच्छा वह होती है जिसका संबंध सामाजिक हित से होता है।

रूसो के सामाजिक समझौता सिद्धांत की विवेचना कीजिए

रूसो द्वारा दिए गए सामाजिक समझौते के सिद्धांत के अनुसार एक अकेला व्यक्ति अपने सभी आवश्यकताएं पूर्ण नहीं कर सकता। इसके लिए एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्तियों के साथ मिलकर एक समूह का गठन करना अनिवार्य होता है। उनका मानना था कि एक व्यक्ति प्रारंभिक अवस्था में सामान्य स्वभाव रखता है परंतु बाद में वह व्यक्ति आपसी संघर्ष के कारण एक दूसरे से घृणा का भाव रखने लगता है। सामाजिक समझौते के सिद्धांत में व्यक्ति को अपने समस्त अधिकारों का त्याग करके अपना संपूर्ण जीवन आदर्श समाज की स्थापना हेतु व्यतीत करना चाहिए।

रूसो एवं प्लेटो के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

रूसो एवं प्लेटो ने कई क्षेत्र में अपनी विचारधाराओं को व्यवस्थित किया था जो कुछ इस प्रकार हैं:-

  • प्लेटो के अनुसार शिक्षा पद्धति विद्यार्थियों के मानसिक शारीरिक एवं सामाजिक क्रियाओं हेतु अवसर प्रदान कराती है परंतु रूसो के अनुसार शिक्षा वह प्रणाली है जो व्यक्ति के अंदर प्रकृति के ज्ञान को बढ़ावा देने का कार्य करती है।
  • प्लेटो की विचार धारा के अनुसार व्यक्ति को सामाजिक व आर्थिक रूप से विकास करना चाहिए परंतु रूसो का मानना था कि व्यक्ति को सामाजिक व आर्थिक रूप से विकास करने के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से भी विकसित होना चाहिए।

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