Uttarakhand ancient painting

उत्तराखंड की चित्रकला का इतिहास

History of ancient painting in Uttarakhand

प्राचीन गुफा चित्र कला (Ancient Cave Paintings)

Ancient Cave Paintings at Lakhudiyar, Almora District, Uttarakhand
Ancient Cave Paintings at Lakhudiyar, Almora District, Uttarakhand
[Image Credit-wikimedia.org]

राज्य में चित्रकला के सबसे प्राचीनतम (Oldest) नमूने (Samples) शैल चित्र (Rock paintings) के रूप में लाखु (Lakhu), ग्वारख्या (Gvarkhya), किमनी गाँव (Kimni Village), ल्वेथाप (Lwathap), हुडली (Hudali), पेटशाल (Petshal), फलसीमा (Phalsima) आदि गुफ़ाओं (Caves) में देखने को मिलते है ।

 उत्तराखंड के कुछ प्राचीनतम कला-स्थल निम्नवत है (Some of the Following Oldest Art-Venue in Uttarakhand) :-

  • अल्मोड़ा (Almora) के लाखु गुफा (Lakhu Cave) के शैल चित्र (Rock Paintings) में मानव को अकेले व समूह में नृत्य (Dance) करते हुए दिखाया गया है। इसके अलावा विभिन्न पशुओं को भी चित्रित किया गया है, इन चित्रों को रंगों से भी सजाया (Decorate) गया है।
  • चमोली (Chamoli) के ग्वारख्या की गुफा (Gvarkhya Cave) में अनेक पशुओं के चित्र मिलते है, जो लाखु के चित्रों से अधिक चटकदार (Bright) है ।
  • चमोली (Chamoli) के किमनी गांव (Kimni Village) के शैलचित्र में हथियार एवं पशुओं के चित्र है, जिन्हें सफेद रंग से रंगा गया है ।
  • अल्मोड़ा (Almora) के ल्वेथाप (Lvethaap) के शैलचित्र में मानव को शिकार करते हुए व हाथों में हाथ डाल कर नृत्य करते हुए दिखाया गया है ।
  • उत्तरकाशी (Uttarkashi) के हुडली गुफा (Hudali Cave) के शैलचित्र (Rock Paintings) में नीले रंग का प्रयोग किया गया है ।

मध्य एवं आधुनिक कला (Middle and Modern Art)

16वी शताब्दी (16th Century) से लेकर 19वी शताब्दी (19th Century) तक राज्य में चित्रकला की ‘गढ़वाली शैली (Garhwali Style)’ प्रचलित थी । गढ़वाली शैली, पहाड़ी शैली (Pahadi Style) का ही एक भाग (Part) है, जिसका विकास (Growth) गढवाल नरेशों (Garhwal Kings) के संरक्षण (Protection) में हुआ ।

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सन् 1658 में गढ़वाल नरेश पृथ्वीपति शाह (Prithvipti Shah) के समय मुगल शहजादा (Mughal Prince) सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) अपने दरबार (Darbar) के दो चित्रकारो (Painters) (तुंवर श्यामदास (Tunvar Shyaamdas) और उनका पुत्र हरदास (Hardas)) को गढ़वाल लेकर आया और इन्हें यहीं छोड़ दिया।हरदास (Hardas) के वंशज (Scion) गढ़वाल-शैली (Gharhwal-Style) के विकास में लगे रहे ।

हरदास का पोता (Grandson of Hardas) मौलाराम तोमर (Molaram Tomar) था । जो गढ़वाल-शैली का सबसे महान चित्रकार (The Great Painter) था, जिसे प्रदीपशाह (Prdeepan Shah), ललितशाह (Lalit Shah), जय कीर्तिशाह (Jay Kirti Shah) व प्रद्धुमनशाह (Praddhuman Shah) का संरक्षण (Protection) मिला । जीवन के अंत तक मोलाराम (Molaram), श्रीनगर (Shrinagar) में अपने चित्रशाला (Art Gallery) में तल्लीन (Absorbed) रहे।

मोलाराम के बाद गढ़वाल-शैली की अवनति (Decline) होने लगी, उनके वंशज वालाराम (Valaram),  शिवराम (Shivram), अजबराम (Ajabram), आत्माराम (Aatmaram), तेजराम (Tejram) आदि गढ़वाल-शैली के अवनति-कालीन (Decadent Period) चित्रकार हुए।

मोलाराम के चित्रों को दुनिया के सामने सर्वप्रथम बैरिस्टर मुकुंदी लाल (Barrister Mukundi Lal) ने रखा ।

प्रमुख चित्र संग्रहालय (Major Art Museum)

  • मोलाराम आर्ट गैलरी (Molaram Art Gallegly) – श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) (Shrinagar (Pauri Garhwal))
  • महाराज नरेंद्रशाहा संग्रह (Maharaj Narendra Shah Museum) – नरेंद्र नगर (टिहरी) (Narendra Nagar (Tehari))
  • कुंवर विचित्रशाह संग्रह (Kunwar Vichitra Shah Museum)- टिहरी (Tehri)
  • राव वीरेंद्र शाह संग्रह (Raw Virendra Shah Museum) – देहरादून (Dehradun)
  • गढ़वाल विश्वविद्यालय संग्राहालय (Garahwal University Museum)- श्रीनगर (Shrinagar)
  • गिरिजा किशोर जोशी संग्रह (Girija Kishor Joshi Museum) – अल्मोड़ा (Almora)
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