उत्तराखंड में शासन-प्रशासन प्रणाली

Government Administration System in Uttarakhand

देश के अन्य राज्यों की तरह इसका भी शासन-प्रशासन संविधान (Constitution) के अध्याय-6 (Chapter 6) के अनुसार संचालित होता है। संविधान के अनुरूप (According) राज्य में शासन-प्रशासन की संसदात्मक प्रणाली लागू है। जिसके तीन प्रमुख संग निम्नलिखित हैं –

  1. कार्यपालिका (राज्यपाल, मंत्री परिषद, सचिवालय, विभाग तथा महाधिवक्ता) (The Executive (Governor, Council of Ministers, The Secretariat, The Department and The Attorney General))
  2. विधान मंडल (राज्यपाल एवं विधानसभा) (The Legislature (Governor and Legislature))
  3. उच्च तथा अधीनस्थ न्यायालय (The High and Subordinate Courts)

कार्यपालिका (The executive)

राज्यपाल (Governor)

संविधान के अनुच्छेद 53 (Article-53) के अनुसार राज्यों के लिए एक राज्याध्यक्ष (Head of State) की व्यवस्था है, जिससे राज्यपाल या गवर्नर (Governor) के नाम से जाना जाता है। राज्यपाल शब्द राज्य सरकार का बोध कराता है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति इसी में निहित है। लेकिन वह इसका प्रयोग अपने अधिनस्थों के माध्यम से करता है। वह राज्य का संवैधानिक (Constitutional) प्रमुख और विवेकाधीन (Arbitrary) शक्तियां प्रयोग करते समय प्रमुख होता है।

राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलपति (Chancellor of Universities) और राज्य का प्रथम नागरिक (The First Citizen of The State) राज्यपाल ही होता है। राज्यपाल की नियुक्ति 5 वर्ष के लिए राष्ट्रपति (Prasident) द्वारा की जाती है I राष्ट्रपति जब चाहे उसे पद से हटा भी सकता है।

  • राज्य के प्रथम राज्यपाल (First Governor of State) – सुरजीत सिंह बरनाला (Surjit Singh Barnala)
  • राज्य के वर्तमान राज्यपाल (Present Governor of State)- के.के. पॉल (K. K. Paul)

मंत्री परिषद (Council of Ministers)

संविधान के अनुच्छेद 164 (Article- 164) के अनुसार राज्यपाल सर्वप्रथम मुख्यमंत्री (Chief Minister) की नियुक्ति करता है। और उसकी सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। नियुक्ति के बाद अनुसूची -3 (Schedule – 3) के तहर पद और गोपनीयता की शपथ दिलाता है।

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राज्य मंत्रिपरिषद (State cabinet) अनेक प्रशासनिक (Administrative), विधायनी (Legislative) तथा वित्तीय (Financial) कार्य करती है। मंत्रीपरिषद ही राज्य के वास्तविक कार्यपालिका का कार्य करती है। मंत्रिपरिषद ही विधानमंडल (Legislature) की पथ-प्रदर्शक तथा शासन की धुरी (Axis) है। यह एक विचारशील और नीति निर्णायक निकाय हैं।

मुख्यमंत्री (Chief Minister)

राज्य कार्यपालिका (Executive) का वास्तविक प्रधान मुख्य मंत्री होता है। वह राज्य के शासन का कप्तान और मंत्रिमंडल में उसकी विशिष्ठ स्थिति होती है। उसके कार्यों  एवं दायित्व की दृष्टि से उसे प्रधानमंत्री का लघु रूप (Short Form) कहा जा सकता है।

  • राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री (First Chief Minister of State) – नित्यानंद स्वामी (Nityanand Swami)
  • वर्तमान मुख्यमंत्री (Present Chief Minister) – हरीश रावत (Harish Rawat)

सचिवालय (The Secretariat)

राज्य की वास्तविक कार्यपालिका (Real Executive) के सदस्य जनप्रतिनिधि (Representatives) होते है। प्रशासनिक सहायता एवं परामर्श (Consultation) के लिए मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक प्रशासनिक निकाय का गठन किया जाता है। जिसे राज्य सचिवालय कहते है।

सचिवालय (Secretariat) के प्रशासनिक अध्यक्ष को मुख्य सचिव (Chief Secretary) और प्रत्येक विभाग के सचिव को ‘शासन सचिव (Governing Secretary)’ कहा जाता है। वह प्रायः IAS का वरिष्ठ (Senior) एवं अनुभवी सदस्य होता है।

सचिवालय राज्य शासन के पर्यवेक्षण निर्देशक (Supervising Director) और नियंत्रण का कार्य करता है। सरकारी नीति चलाने हेतु आवश्यक सामग्री एकत्रित करना और उसका विश्लेषण कर मंत्री परिषद के सम्मुख प्रस्तुत करना सचिवालय का कार्य है।

राज्य प्रशासन के मुख्य सचिव का पद प्रशासनिक पद से अधिक महत्वपूर्ण है। राज्य में जो स्थान और कार्य मुख्य सचिव का है, केंद्र में वही स्थान और कार्य कैबिनेट सचिव (Cabinet Secretary) का है। मुख्य सचिव राज्य प्रशासन की धुरी (Axis) है।

  • प्रथम मुख्य सचिव (First Chief Secretari of the State) – श्री अजय विक्रम सिंह (Mr Ajay Vikram Singh)
  • वर्तमान मुख्य सचिव (Present Chief Secretari) – शत्रुघ्न सिंह (Shatrughan Singh)

कार्यकारी विभाग (निर्देशालय) (Executive Department (Nirdeshaly))

राज्य प्रशासन में मंत्रिपरिषद (Council of Ministers), सचिवालय (Secretariat) के बाद तीसरा अवयव कार्यकारी विभाग (Executive Department) का होता है। ऊपर से दोनों अवयवों का संबंध नीति निर्णायक (Policy Deciding) से है, जबकि कार्यकारी विभाग क्रियान्वयन (Execution) के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार संस्था (Institution) है।

एक शासन सचिव (Governing Secretary) के अंदर कई विभाग होते है। जैसे:- गृह सचिव के अंतर्गत (Under Secretary), पुलिस (Police), जेल (Prison), आंतरिक सुरक्षा (Internal Security) आदि विभाग।

सामान्य एवं राजस्व प्रशासन (Revenue Administration) में विभागाध्यक्ष (Head of Department) के बाद मंडलायुक्त (Divisional Commissioner) होता है, जो अपने मंडल (Divisional) के शांति-व्यवस्था (Peace and Order), राजस्व वसूली (Revenue Recovery) तथा अन्य कार्यों को देखता है। वर्तमान में राज्य में दो मंडल कुमाऊं (Kumaon) एवं गढ़वाल (Garhwal) मंडल है। गढ़वाल मंडल में सर्वाधिक 7 जिले तथा कुमाऊ मंडल में 6 जिले हैं।

महाधिवक्ता (Advocate General)

संविधान के अनुच्छेद 165 (Article- 165) के अनुसार राज्य में महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है I इस पद पर नियुक्त होने के लिए आवश्यक है, कि :-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • 10 वर्ष से अधिक समय से न्यायिक कार्य से जुड़ा हो या कम से कम 10 वर्ष से उच्च न्यायालय में अधिवक्ता का कार्य किया है।

इस विधि विषयों पर राज्यपाल को सलाह देता है एवं राज्यपाल द्वारा सौपी गई विधि संबंधी कार्यों का संपादन करता है। वह सदनों की बैठकों में भाग ले सकता है, बोल सकता हैं, लेकिन मतदान नहीं कर सकता राज्य है।

  • राज्य का प्रथम महाधिवक्तामेहरबान सिंह नेगी (Mehrbaan Singh Negi)
  • वर्तमान महाधिवक्ता – विजय बहादुर सिंह नेगी (Vijay Bahadur Singh Negi)

विधानमंडल (Legislature)

राज्य में विधि (Law) निर्माण के लिए विधानमंडल की व्यवस्था की गई है।

  • विधानमंडल के दो अंग है :- राज्यपाल (Governor) और विधानसभा (Assembly) ।

राज्यपाल (Governor)

विधानमंडल (Legislature) में सबसे ऊपर राज्यपाल का स्थान होता है। उसके हस्ताक्षर (Signature) के बिना कोई कानून प्रवर्तन (Actuation) में नहीं आ सकता। राज्यपाल, विधानसभा के अधिवेशन (Session) को आहूत (Convened) करता, सत्रावसान (Prorogation) करता तथा विघटन (Dissolution) करता है। वह सदन (House) का सत्र शुरू होने पर सदन के अभिभाषण (Address) करता, बजट (Budget) रखवाता, साक्ष्यों की निर्भरता का निश्चय करता, विधेयकों (Bills) को राष्ट्रपति के पास भेजने के लिए आरक्षित रखता तथा विशेष परिस्थितियों (Special conditions) में जब सदन सत्र में न हो तो अध्यादेश (Ordinance) जारी करता है। यह सभी राज्यपाल के विधायीका कार्य है।

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विधानसभा (Assembly)

विधानसभा का गठन संविधान के अनुच्छेद 170 (Article 170) के तहत राज्यों के वयस्क मतदाताओं (Adult voters) द्वारा चुने गए सदस्यों द्वारा होता है। इसी अनुच्छेद के तहत यह भी व्यवस्था है कि किसी राज्य की विधानसभा में अधिक से अधिक 500 और कम से कम 60 सदस्य हो सकते है।

विधानसभा सदस्यों (Assembly members) का चुनाव विधानसभा क्षेत्रों के वयस्क मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रीति (Direct Manner) से किया जाता है।

अनुच्छेद 173 में विधानसभा की सदस्यता के लिए निर्धारित योग्यता वही है, जो लोकसभा के लिए निर्धारित है – वह भारत का नागरिक हो, वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका होगा, वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के पद पर कार्यरत न हो तथा संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन राज्य विधानसभा का सदस्य चुने जाने के अयोग्य ना हो।

विधानसभा का सदस्य चुने जाने के बाद और पद ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल या उसका प्रतिनिधि (Representative) तीसरी अनुसूची (Third Schedule) के अनुसार शपथ (Oath) दिलाता है।

विधानसभा का विघटन (Dissolution) उसके 5 वर्ष पूर्ण होने से पूर्व ही किया जा सकता है। इसका विघटन (Dissolution) मंत्री परिषद की सलाह पर राज्यपाल द्वारा किया जाता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लागू होने की स्थिति में भी विधानसभा का विघटन किया जा सकता है।

विधानसभा की बैठक में गणपूर्ति (Quorum) के लिए कम से कम 1/10 सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है तथा यह संख्या किसी भी हालत में 10 से कम नहीं होनी चाहिए।

विधानसभा सत्र वर्ष में कम से कम 2 बार आहूत (Convened) किया जाना आवश्यक है, तथा किन्ही दो सत्रों के बीच 6 माह से अधिक का अंतराल (Interval) नहीं होना चाहिए। विशेष परिस्थितियों (Special conditions) में विधानसभा पर विशेष सत्र (Special Session) राज्यपाल द्वारा बुलाया जा सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 178 के अनुसार विधानसभा के सदस्य अपने में से किसी एक सदस्य को अध्यक्ष तथा एक को उपाध्यक्ष चुनते हैं।

विधानसभा भंग (Dissolution) होने पर अध्यक्ष अगली नवनिर्वाचित (Newly elected) विधानसभा के प्रथम अधिवेशन होने तक अपने पद पर बना रहता है।

विधानसभा अध्यक्ष सामान्यता 5 वर्षों के लिए निर्वाचित किया जाता है। किंतु वह इसके पहले उपाध्यक्ष को अपना इस्तीफा (Resignation) देकर पद छोड़ सकता है। यदि अध्यक्ष विधानसभा का सदस्य नहीं रहे तो भी उसे अध्यक्ष पद त्यागना पड़ता है। इसके अलावा विधानसभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत (Majority) के प्रस्ताव के द्वारा भी अध्यक्ष को प्रस्ताव के द्वारा भी बेदख़ल (Ousted) किया जा सकता है। परन्तु ऐसा प्रस्ताव पेस करने से पूर्व अध्यक्ष को 14 दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है। जब अध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत हो तो अध्यक्ष उस बैठक की अध्यक्षता नहीं करता परंतु उसमें भाग लेने और मत देने का पूर्ण अधिकार होता है।

विधानसभा का अध्यक्ष (Assembly Speaker) वही कार्य करता है जो लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) करता है।

विधान सभा सदस्यों की संख्या (Assembly Members)

गठन से पूर्व राज्य में विधानसभा की कुल 22 तथा विधानपरिषद (Legislative Assembly) की 9 सीटों थी । गठनोपरान्तकी (After Build) 5 नवंबर (November) 2001 को सत्र परिसीमन (Limitations) के बाद विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 70 हो गई।

राज्य की विधानसभा में कुल 70 सीटों में से आरक्षित (Reserve) सीटों की संख्या 15 (13 SC + 2 ST ) है।

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें चकराता (देहरादून) (Chakrata (Dehradun)) एवं नानकमत्ता (उधमसिंह नगर) (Nanakmattha (Udham Singh Nagar)) में है।

अंतरिम विधानसभा (Interim Assembly)

उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2000 (Uttar Pradesh Reorganisation Bill, 2000) में उत्तराखंड में अंतरिम विधानसभा (Interim Assembly) हेतु 31 विधायकों (Legislators) की व्यवस्था की गई थी। 21 विधायकों में से 22 सदस्य 1996 में उत्तर प्रदेश विधानसभा (Assembly) के लिए चुने गए थे, जबकि 9 उत्तर प्रदेश विधानपरिषद (Legislative Assembly) के सदस्य थे। अंतरिम विधानसभा के गठन से ठीक पहले विधानपरिषद के 9 सदस्यों में से एक सदस्य का कार्यकाल समाप्त हो जाने के कारण गठन के समय विधानपरिषद के सदस्यों की संख्या 8 रह गई थी। अतः अंतरिम विधानसभा (Interim Assembly) का गठन 30 से किया गया।

भाजपा का बहुमत (Majority) होने के कारण 9 नवंबर () 2000 को उसी (भाजपा) के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ और राजपाल, सुरजीत सिंह बरनाला (Governor, Surji Singh Barnala) ने नित्यानंद स्वामी (Nityanand Swami) को राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाया। अंतरिम मंत्रीपरिषद में मुख्यमंत्री सहित 9 मंत्री तथा 4 राज्यमंत्री थे।

अंतरिम विधानसभा के कुल 30 विधायकों में से 23 भाजपा के, 3 सपा के तथा 2-2 बसपा व कांग्रेस के थे।

नित्यानंद स्वामी के त्यागपत्र (Resignation) देने के बाद 29 अक्टूबर (October) 2001 को भगत सिंह कोशियारी (Bhagat Singh Koshiyari) अंतरिम सरकार (Interim Government) के दूसरे मुख्यमंत्री बने और 2 मार्च (March) 2002 तक मुख्यमंत्री रहे।

अंतरिम विधानसभा के अध्यक्ष (Interim President of the Assembly) प्रकाश पंत (Parkash Pant) बनाए गए थे और प्रथम सत्र 9 जनवरी (January) 2001 से शुरू हुआ था।

संसद में प्रतिनिधित्व (Representation in Parliament)

राज्य में लोकसभा (Lok Sabha) की 5 तथा राज्यसभा (Rajy Sabha) की 3 सीटें (Seats) हैं, लोकसभा क्षेत्र अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, नैनीतालहरिद्वार (Almora, Pauri, Tehri, Nanital and Haridwar) है। 2008 के परिसीमन (Limitations) के अनुसार प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की 14-14 सीटें है। अल्मोड़ा (Almora) की सीट अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) के लिए सुरक्षित हैं।

न्यायपालिका (Judiciary)

न्यायपालिका शासन का तीसरा महत्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य कार्य विधि (Law) की व्याख्या करना है। यह विधायिका (Legislature) एवं कार्यपालिका (Executive) पर वहां तक नियंत्रण स्थापित करती है, जहां तक यह निकाय विधान (Legislative body) और संविधान से परे (Beyond) जाकर कार्य करने लगते हैं। न्यायपालिका को नागरिकों के अधिकारों का रक्षक एवं संविधान का सजग प्रहरी कहा जाता है। प्रदेश में ने प्रशासन के शीर्ष पर एक उच्च न्यायालय (High Court) है। उच्च न्यायालय के नियंत्रण में अनेक अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts) है। जैसे :- जिला न्यायालय (District Courts), पारिवारिक न्यायालय (Family Court), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (State Legal Services Authority) एवं विधिक सेवा समितियां (Legal Services Committees) आती है।

उच्च न्यायालय (High Court)

संविधान के अनुच्छेद 214 के तहत प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय  (High Court) का प्रावधान (Provision) किया गया है। इस अनुच्छेद के अनुसार 9 नवंबर (November) 2000 को देश के 20वें उच्च न्यायालय के रूप में नैनीताल (Nainital) में उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) की स्थापना की गई।

वर्तमान में राज्य उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों (Judges) की स्वीकृत (Approved) पदों की कुल संख्या 8 है। 

  • राज्य उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश (The first Chief Justice of the High Court) – न्यायमूर्ति अशोक अभ्यंकर देसाई (Justice Ashok Abhyankar Desai)
  • वर्तमान मुख्य न्यायाधीश (Present Chief Justice of the High Court) – के. एम. जोसेफ (K. M. Joseph)
  • प्रथम रजिस्ट्रार (First Registrar) –     जी.सी.एस. रावत (G. G. S. Rawat)
  • वर्त्तमान रजिस्ट्रार (Present Registrar) – श्री नरेन्द्र दत्त (Shri Narendra Dutt)

मुकदमों के शीघ्र निपटारे हेतु अप्रैल (April) 2001 में 45 ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast track court)’ का गठन किया गया।

राज्य में लोक अदालतों (Lok Adalat) की व्यवस्था भी की गई है, जो लोगों को नि:शुल्क कानूनी सहायता प्रदान करती है। लोक अदालतों की व्यवस्था व संचालन के लिए सरकार ने उत्तराखंड कानूनी सहायता एवं परामर्श बोर्ड (Uttarakhand Legal Aid and Advisory Board) की स्थापना की है ।

राज्य के विभिन्न जिलों में बोर्ड की इकाइयों (Board Units) का भी गठन किया गया है। जिन्हे ‘जिला कानूनी सहायता एवं परामर्श समिति (District Legal Aid and Advisory Committee)’ कहा जाता है।

प्रदेश के पंचायतीराज कानून (Panchayati Raj Act) के अंतर्गत में पंचायतों (Panchayats) का भी गठन किया गया है, जो कुछ मामलों में ₹500 तक के मामलों की सुनवाई कर सकते हैं।

लोकायुक्त (Lokayukta)

राज्य शासन-प्रशासन (Government administration) में अधिकारों के दुरुपयोग (Misuse), भ्रष्टाचार (Corruption) एवं कदाचार (Act of Misconduct) संबंधी शिकायतों का अन्वेषण (Exploration) करने पर राज्य सरकार को इस संबंध में संस्तुति (Recommendation) भेजने हेतु लोकायुक्त संगठन (Lokayukta) स्थापित करने संबंधी एक नया विधेयक राज्य विधानसभा द्वारा 1 नवंबर (November) 2011 को पारित किया गया। इस में मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रीगण, विधायक व IAS सहित लोक सेवक जांच दायरे में लाया गया है।

नये कानून के अनुसार किसी भी शिकायत की सुनवाई के लिए लोकायुक्त के लिए तीन विंग (Wing) है। अन्वेषण शाखा (Investigations Branch), अभियोजन शाखा (Prosecutions Branch) और न्यायिक शाखा (Judicial Branch) किसी शिकायती आवेदन पर अथवा स्वतः किसी मामले का संज्ञान (Cognition) लेकर लोकायुक्त नोटिस भेज सकता है। राज्य की विजिलेंस इकाई (Vigilance Unit) लोकायुक्त के अधीन रखी गई हैं।

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