भाषा और बोली में अंतर - बोली और मानक भाषा में अंतर

भाषा और बोली में अंतर – बोली और मानक भाषा में अंतर

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भाषा क्या है

भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से एक व्यक्ति अपने विचारों को व्यक्त कर सकता है जिसके लिए उस व्यक्ति के द्वारा वाचिक ध्वनियों का प्रयोग किया जाता है। भाषा के माध्यम से व्यक्ति लिखकर, पढ़कर, बोलकर या सुनकर अपने विचारों को प्रकट करता है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो सार्थक शब्दों के समूह को भाषा कहा जाता है। भाषा वह माध्यम है जिससे मनुष्य अपने भावों का आदान-प्रदान आसानी से कर सकता है। यह मुख्य रूप से मुख से उच्चरित होने वाले शब्दों एवं वाक्यों का समूह होता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपने मन की बात को दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाता है। प्राचीन धारणाओं के अनुसार भाषा वह पद्धति है जिसमें कर्ता, कर्म, क्रिया आदि को व्यवस्थित किया जा सकता है।

भाषा के अंग

भाषा के मुख्य रूप से 5 अंग होते हैं जो कुछ इस प्रकार हैं:-

  • वर्ण
  • शब्द
  • ध्वनि
  • वाक्य
  • लिपि

वर्ण

वर्ण हिंदी भाषा की सबसे छोटी इकाई होती है जिसका विभाजन नहीं किया जा सकता है। लेखन के आधार पर वर्ण 52 प्रकार के होते हैं जिसमें 13 स्वर, 35 व्यंजन एवं 4 संयुक्त व्यंजन होते हैं। भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि होती है जिसे वर्ण के रूप में प्रकट किया जाता है। देवनागरी लिपि में प्रत्येक ध्वनि के लिए एक निश्चित वर्ण की उपस्थिति होती है।

शब्द

ध्वनियों के मेल से बने वर्ण समूह को शब्द कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से एक से अधिक वर्णों का प्रयोग किया जाता है। आसान शब्दों में कहा जाए तो एक यह एक से अधिक बहुविकल्पी शब्दों से निर्मित स्वतंत्र सार्थक इकाई शब्द कहलाते हैं। यह वर्णों का वह समूह होता है जिसका कोई ना कोई अर्थ अवश्य निकलता है।

ध्वनि

उच्चारण एवं श्रवण के दृष्टिकोण से स्वतंत्र व्यक्तित्व रखने वाली भाषा में प्रयुक्त होने वाली ध्वनि के लघुतम इकाई को भाषा ध्वनि कहा जाता है। ध्वनि का उपयोग केवल मौखिक भाषा में ही किया जा सकता है। यह हमारे मुख से निकलने वाली स्वतंत्र आवाज होती है।

वाक्य

शब्दों को व्याकरण के अनुसार व्यवस्थित करने को वाक्य कहा जाता है। किसी भी वाक्य के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी बात को दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने में असमर्थ होता है। वाक्य मुख्य रूप से वर्णों का वह समूह होता है जिसका कोई ना कोई अर्थ अवश्य निकलता है।

लिपि

भाषा की लिखावट के ढंग को लेखन प्रणाली या लिपि कहा जाता है। किसी भी भाषा को लिखने के लिए लिपि की आवश्यकता होती है। लिपि का उपयोग मौखिक भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने हेतु किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से मौखिक भाषा को अंकित करने के लिए विभिन्न प्रकार के चिह्नों का प्रयोग किया जाता है।

भाषा के प्रकार

भाषा मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं जैसे:-

  • लिखित भाषा
  • मौखिक भाषा
  • सांकेतिक भाषा

लिखित भाषा

जब कोई व्यक्ति अपने मन के विचारों एवं भावों को लिखकर समाज के समकक्ष प्रकट करता है तो उसे लिखित भाषा कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से पत्राचार, समाचार, कहानी लेखन, पत्रिकाएँ, संस्मरण, कंप्यूटर आदि का सहारा लिया जाता है। पत्र लेखन लिखित भाषा का बेहतर उदाहरण माना जाता है। यह भाषा का एक स्थाई रूप होता है जिसमें कोई व्यक्ति अपने विचारों को अनंत काल तक सुरक्षित रख सकता है। लिखित भाषा में वक्ता एवं श्रोता का आमने-सामने होना अनिवार्य नहीं होता। इसकी आधारभूत इकाई “वर्ण” होती है जो उच्चरित ध्वनियों को भी अभिव्यक्त कर सकते हैं।

मौखिक भाषा

मौखिक भाषा को भाषा का मूल रूप माना जाता है क्योंकि लिखित भाषा की तुलना में मौखिक भाषा का महत्व अधिक होता है। यह भाषा का आरंभिक चरण होता है जिसका उच्चारण करने से व्यक्ति अपने भावों को आसानी से प्रकट करता है। इसमें वक्ता या कर्ता अपने मुख से बोलकर श्रोता को अपनी बात समझाता है। यह भाषा का प्राचीनतम स्वरूप माना जाता है जिसे मनुष्य ने सर्वप्रथम सीखा था। मौखिक भाषा का प्रयोग व्यापक स्तर पर किया जाता है। यह आम बोल-चाल का रूप है। मनुष्य को भाषा का मौखिक रूप सीखने के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता क्योंकि मौखिक भाषा का इतिहास मनुष्य के जन्म के साथ जुड़ा हुआ होता है।

सांकेतिक भाषा

सांकेतिक भाषा वह होती है जो विभिन्न प्रकार के दृश्य संकेतों के माध्यम से अभिव्यक्त की जाती है। इस प्रकार की भाषा को व्यक्त करने के लिए विभिन्न प्रकार से हाथों के आकार, शरीर या चेहरे के हाव-भावों का एक साथ उपयोग किया जाता है जिससे अगले व्यक्ति को अपनी बात को आसानी से समझाया जा सके। सांकेतिक भाषा में लिखित या मौखिक भाषा का उपयोग नहीं किया जा सकता है। सांकेतिक भाषा मुख्य रूप से मां एवं छोटे बच्चों के बीच वार्तालाप करने की भाषा होती है। इसके अलावा शारीरिक रूप से दिव्यांग व्यक्ति जैसे कान, आंख एवं मुख से अपंग व्यक्ति भी सांकेतिक भाषा का मुख्य रूप से प्रयोग करते हैं।

भाषा की विशेषताएँ

भाषा मनुष्य को अन्य पशु-पक्षियों से अलग करती है। वर्तमान समय में पशु-पक्षियों की अनेकों प्रजातियां मानव समूहों के बीच में रहती है। पशु-पक्षी अपने भावों को व्यक्त करने के लिए किसी भाषा का उपयोग नहीं करते हैं बल्कि यह केवल संकेत के माध्यम से ही अपने भाव को प्रकट करते हैं। मनुष्य में भाषा, समुदाय की परंपरा एवं संस्कृति को बनाए रखने का एक विशेष साधन होता है। भाषा की प्रकृति को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है जिसमें पहला भाषा की सर्वमान्य प्रकृति है एवं दूसरा भाषा की भिन्नता है। भाषा की सर्वमान्य प्रकृति वह होती है जो सभी भाषाओं के लिए उपर्युक्त या मान्य होती है एवं भाषा की भिन्नता वह होती है जो एक भाषा को दूसरे भाषा से अलग करती है।

भाषा की प्रमुख विशेषताएं कुछ इस प्रकार हैं:-

  • भाषा मुख्य रूप से माननीयकरण के नियमों पर आधारित होती है।
  • भाषा की निश्चित सीमाएं होती हैं जिसका उल्लंघन किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जा सकता है।
  • भाषा पैतृक एवं व्यक्तिगत संपत्ति ना होकर एक सामाजिक संपत्ति मानी जाती है।
  • भाषा वार्तालाप एवं पत्राचार के दृष्टिकोण से बेहतर मानी जाती है।
  • भाषा सर्वव्यापक होती है जिसका उपयोग विश्व का हर व्यक्ति करता है।
  • भाषा का प्रवाह कठिन से सरलता की ओर होता है क्योंकि यह भावों को व्यक्त करने का बेहतर साधन होता है।
  • भाषा का प्रारंभिक रूप उच्चरित होता है एवं इसका आरंभ वाक्य के माध्यम से हुआ है।
  • भाषा मुख्य रूप से संयोगावस्था से वियोगावस्था की ओर बढ़ती है।
  • भाषा का उपयोग मौखिक, लिखित एवं संकेत के माध्यम से भी किया जा सकता है।

भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत

विद्वानों ने भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांत को कई भागों में विभाजित किया है जो कुछ इस प्रकार हैं:-

  • दिव्य उत्पत्ति सिद्धांत
  • अनुकरण सिद्धांत
  • धातु सिद्धांत
  • संकेत सिद्धांत
  • श्रम परिहरण सिद्धांत
  • मनोभाव सूचक सिद्धांत
  • अनुसरण सिद्धांत

दिव्य उत्पत्ति सिद्धांत

दिव्य उत्पत्ति सिद्धांत भाषा के प्राचीनतम सिद्धांतों में से एक है। कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा परमात्मा की देन है जिसका अर्थ यह है कि भाषा ना ही परंपरागत है और ना ही मनुष्य द्वारा अर्जित किया गया है। उनके अनुसार भाषा वह शक्ति है जो मनुष्य के साथ ही जन्म लेती है और जिसे सीखने के लिए किसी विशेष प्रकार का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं होती। इसके अलावा कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि दिव्य उत्पत्ति सिद्धांत संसार के विभिन्न धर्म ग्रंथों की भाषाओं से ली गई हैं।

अनुकरण सिद्धांत

कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा की उत्पत्ति अनुकरण सिद्धांत के आधार पर हुई है। “लिव वाइगोत्सकी” के अनुसार एक बच्चा सामाजिक अंत क्रिया के माध्यम से भाषा को अर्जित करता है। यह प्रक्रिया बेहद सरल एवं सहज भाव को दर्शाती है। उनके अनुसार यदि परिवार का कोई सदस्य किसी भाषा का उपयोग करता है तो मातृभाषा के प्रभाव से वह भाषा बच्चे में भी आ जाती है।

धातु सिद्धांत

धातु सिद्धांत के समर्थकों का यह मानना है कि प्रारंभिक काल से ही मानव जिन बाह्य वस्तुओं के संपर्क में आता है तो उनसे निकलने वाली ध्वनियों एवं उनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले भाषाओं के आधार पर वह स्वयं ही शब्दों का निर्माण कर लेता है। धातु सिद्धांत को सर्वप्रथम प्लेटो ने संपादित किया था।

संकेत सिद्धांत

भाषा के संकेत सिद्धांत को प्रतीकवाद, स्वीकारवाद एवं निर्णय सिद्धांत भी कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य सर्वप्रथम हाथ, पैर या सिर से विशेष प्रक्रिया करके अपने भावों को अभिव्यक्त करता है। माना जाता है कि संकेत के माध्यम से मानव ने ध्वनि का अनुकरण किया था जिसके बाद शब्दों की रचना हुई थी।

श्रम परिहरण सिद्धांत

कुछ विद्वानों के अनुसार मनुष्य श्रम परिहरण सिद्धांत का पालन तब करता है जब वह थकने लगता है। अधिक परिश्रम करने के कारण जब मनुष्य थकान को दूर करने के लिए कुछ ध्वनियों का उच्चारण करता है तो उसे श्रम परिहरण सिद्धांत कहा जाता है। इस स्थिति में मनुष्य की साँसें तीव्र गति से चलने लगती है जिसके कारण मनुष्य के वाग्यंत्र की स्वर तंत्रिकाओं में कंपन होने लगता है। श्रम परिहरण सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार भाषा की उत्पत्ति इसी आधार पर हुई थी।

मनोभाव सूचक सिद्धांत

भाषा की उत्पत्ति का यह सिद्धांत मानवों की विभिन्न भावनाओं की सूचक ध्वनियों पर आधारित होता है। मनोभाव सूचक सिद्धांत को प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैक्समूलर ने पूह-पूह के सिद्धांत का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य एक भावना प्रधान प्राणी होने के साथ-साथ एक विचारशील प्राणी भी है जिसमें निरंतर हर्ष, दुःख, आश्चर्य, क्रोध आदि के भाव उठते रहते हैं। मनोभाव सूचक सिद्धांत के समर्थकों का यह तर्क है कि भाषा की उत्पत्ति मनुष्य के इसी भाव के कारण हुई है।

अनुसरण सिद्धांत

अनुसरण सिद्धांत के समर्थकों का यह मानना है कि मानवों ने अपने आसपास की वस्तुओं से उठने वाली ध्वनियों के आधार पर भाषा का निर्माण किया है। यह सिद्धांत अनुकरण सिद्धांत से मिलता-जुलता सिद्धांत होता है। अनुकरण सिद्धांत में मुख्य रूप से जीवित वस्तुओं की बात कही गई थी जबकि अनुसरण सिद्धांत में निर्जीव वस्तुओं के अनुकरण की चर्चा की गई है।

बोली क्या है

बोली मुख्य रूप से भाषा का वह स्वरूप होता है जिसका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में वार्तालाप करने हेतु किया जाता है। विश्व भर में बोली जाने वाली विभिन्न प्रकार की बोलियाँ सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आधार पर अपने क्षेत्र का विकास कर सकती हैं। जब किसी क्षेत्रीय बोली में साहित्य की रचना का विस्तार होता है तो उसे उपभाषा के नाम से जाना जाता है। बोली भाषा का क्षेत्रीय रूप होता है। बोली में स्थानीय स्वरूप होने के कारण उसका क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित होता है। शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में बोली का विशेष महत्व होता है। विश्व भर में बोली जाने वाली अनेकों बोलियाँ मिलकर भाषा को समृद्ध करने का कार्य करती हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 650 से अधिक बोलियाँ बोली जाती हैं।

बोली के प्रकार

हिंदी भाषा की बोलियों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया गया है:-

  • पूर्वी हिंदी बोलियाँ
  • पश्चिमी हिंदी बोलियाँ
  • बिहारी हिंदी बोलियाँ

पूर्वी हिंदी बोलियाँ

पूर्वी हिंदी बोलियाँ अवधि बोली के नाम से प्रचलित है जिस में मुख्य रूप से 3 प्रकार की बोलियों होती है अवधि, बघेली एवं छत्तीसगढ़ी।

पश्चिमी हिंदी बोलियाँ

पश्चिमी हिंदी की 5 प्रमुख बोलियाँ मानी जाती हैं जैसे हरियाणवी, ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली एवं खड़ी बोली या कौरवी।

बिहारी हिंदी बोलियाँ

बिहारी हिंदी बोलियों की चार प्रमुख बोलियाँ होती है जैसे मगही, भोजपुरी, मैथिली एवं अंगिया।

बोली की विशेषताएँ

बोली के विशेषताएँ कुछ इस प्रकार हैं:-

  • बोलिए में व्याकरण एवं साहित्य की आवश्यकता नहीं होती है।
  • बोली का स्वरूप स्वतंत्र होता है अर्थात यह किसी भी स्थान या मंच पर बिना किसी नियमों का पालन किए हुए बोली जा सकती है।
  • बोली में साहित्य की रचना नहीं होती यह किसी भी प्रकार से लिखी या बोली जा सकती है।
  • बोलियाँ मुख्य रूप से भाषा का क्षेत्रीय स्वरूप होती है।

मानक भाषा किसे कहते हैं

मानक भाषा वह भाषा होती है जो किसी देश या राज्य का प्रतिनिधित्व करती है। यह एक देश की आदर्श भाषा कहलाती है जिसका उपयोग मुख्य रूप से उस देश के प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। इसके अलावा मानक भाषा का प्रयोग सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, व्यापारिक, साहित्यिक एवं शिक्षक वर्ग के लोगों द्वारा भी मुख्य रूप से किया जाता है। मानक भाषा को आदर्श, श्रेष्ठ एवं परिनिष्ठित भाषा के नाम से भी जाना जाता है।

हिंदी बोली की मानक भाषाएँ

हिंदी बोली के अंतर्गत मुख्य रूप से पांच प्रकार की मानक भाषाओं का उपयोग किया जाता है। हरियाणवी, ब्रज, बुंदेली, खड़ी बोली, कन्नौजी एवं खड़ी बोली।

मानक भाषा की विशेषताएँ

मानक भाषा किसी भी भाषा का वह स्वरूप होता है जिसका प्रयोग पूरे क्षेत्र में शुद्धता से किया जाता है। इसे देश एवं प्रदेश के शिक्षित वर्ग के लोग अपना आदर्श मानते हैं एवं विभिन्न क्षेत्रों में इसका उपयोग भी करते हैं। मानव भाषाओं का उपयोग मुख्य रूप से लेखन, प्रशासन, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में किया जाता है। इसके अलावा मानक भाषाओं की कई अन्य विशेषताएँ भी होती हैं जो कुछ इस प्रकार हैं:-

  • मानक भाषा देश के लगभग सभी क्षेत्रों में सर्वमान्य होती है।
  • मानक भाषा का स्वरूप केवल एक ही होता है जिसके कारण उसमें क्षेत्रीय एवं स्थानीय प्रयोगों से संरक्षण की प्रवृत्ति होती है।
  • यह भाषा आधुनिक युग के अनुसार निरंतर विकसित होते रहती है।
  • मानक भाषा सुनिर्धारित, सुस्पष्ट एवं सुनिश्चित होती है जिसके कारण इसमें आसानी से बदलाव नहीं किया जा सकता है।
  • मानक भाषा देश की संस्कृति, शिक्षा पद्धति, प्रशासनिक व्यवस्था एवं संवैधानिक क्षेत्रों के कार्यों को संपादित करने में सक्षम होती है।
  • मानक भाषा में नए शब्दों का निर्माण एवं उन्हें ग्रहण करने की क्षमता होती है।
  • इस भाषा में क्षेत्रीय एवं शैलीगत उतार-चढ़ाव होने के बावजूद भी वह स्थिर एवं शुद्ध होती है।
  • मानक भाषा मुख्य रूप से किसी देश का प्रतिनिधित्व कर सकती है।

भाषा और बोली में अंतर

भाषा और बोली में निम्न प्रकार के अंतर होते हैं:-

  • किसी भाषा में साहित्य प्रचुर मात्रा में होता है जबकि बोली में साहित्य का अभाव होता है।
  • भाषा का क्षेत्र मुख्य रूप से विस्तृत होता है परंतु बोली का क्षेत्र सीमित होता है।
  • भाषा का प्रयोग राज कार्यों या प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है जबकि बोली का उपयोग आम बोलचाल में किया जाता है।
  • भाषा का उपयोग शिक्षित वर्ग के लोग शिक्षा प्रदान करने में करते हैं जबकि बोली का उपयोग शिक्षा प्रदान करने में नहीं किया जा सकता।
  • भाषा में विभिन्न प्रकार की बोलियाँ हस्तक्षेप कर सकती हैं जबकि बोली में भाषा का हस्तक्षेप नहीं हो सकता।
  • भाषा विभिन्न प्रकार की बोलियों से मिलकर बनाई गई है परंतु बोली का स्वरूप स्वतंत्र होता है वह किसी भी भाषा से संबंध नहीं रखती है।
  • भाषा को सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं सामाजिक मान्यताएँ प्राप्त होती हैं जबकि बोली को किसी भी प्रकार की मान्यता की आवश्यकता नहीं होती।
  • भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है परंतु बोली को राजभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है।
  • किसी भी भाषा के द्वारा साहित्यिक रचना करना संभव होता है परंतु बोली के द्वारा साहित्यिक रचना करना असंभव होता है।
  • भाषा को लिपि की आवश्यकता होती है परंतु बोली को किसी भी प्रकार की लिपि की आवश्यकता नहीं होती।
  • भाषा का उपयोग मुख्य रूप से हिंदी व्याकरण में किया जा सकता है परंतु बोली का उपयोग हिंदी व्याकरण में नहीं किया जा सकता।

भाषा और बोली में अंतर बताते हुए देवनागरी लिपि की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए

अधिकांश भाषाओं की तरह ही देवनागरी लिपि की रचना भी दाएं से बाएं की जाती है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द के ऊपर एक रेखा अंकित होती है जिसे शिरोरेखा के नाम से जाना जाता है। इसका उद्गम ब्राह्मी लिपि से हुआ है जो एक ध्वन्यात्मक लिपि है। भारत की विभिन्न लिपियां देवनागरी लिपि से संबंधित हैं जैसे बंगाली, गुजराती, गुरुमुखी, पंजाबी आदि। यह विश्व की समस्त लिपियों में सर्वश्रेष्ठ लिपि मानी जाती है। यह लिपि अक्षरात्मक होती है जिसमें बड़ी ही सुंदरता से कई सारे अक्षरों का मेल देखा जा सकता है। देवनागरी लिपि में कई प्रकार के गुण विद्यमान होते हैं जिसके कारण इसे आदर्श लिपि भी कहा जाता है। भारत में काफी लंबे समय से देवनागरी लिपि का प्रयोग अनेकों भाषाओं में किया जाता है।

बोली और मानक भाषा में अंतर स्पष्ट कीजिए

बोली और मानक भाषा में निम्न प्रकार के अंतर देखे जा सकते हैं:-

  • बोली पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होती है जबकि मानक भाषा किसी भाषा का वह स्वरूप होता है जिससे पूरे क्षेत्र में शुद्ध मानी जाती है।
  • बोली आम जनमानस के वार्तालाप का माध्यम होता है जिसका उपयोग कोई भी व्यक्ति कर सकता है परंतु मानक भाषा का प्रयोग केवल प्रशासन या शिक्षित वर्ग के लोगों द्वारा ही किया जाता है।
  • बोली का उपयोग करना शिक्षा क्षेत्र, व्यापार क्षेत्र, लेखन कार्यों में एवं औपचारिक परिस्थितियों में अनिवार्य नहीं होता जबकि मानक भाषा का प्रयोग इन सभी क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से किया जाता है।
  • बोली का स्वरूप पूरे देश एवं प्रदेश में एक समान नहीं होता जबकि मानक भाषा का स्वरूप पूरे देश में एक समान रहता है।
  • बोली भाषा के स्वरूप को बदलती रहती है जबकि मानक भाषा, भाषा के स्वरूप को स्थिरता प्रदान करती है।
  • बोली का स्वरूप भाषा को अव्यवस्थित कर सकता है जबकि मानक भाषा, भाषा के स्वरूप को अव्यवस्थित होने से रोकता है।
  • बोली का स्वरूप स्वतंत्र होता है अर्थात यह व्याकरण को स्वतंत्रता पूर्वक बदल सकता है परंतु मानक भाषा का स्वरूप स्वतंत्र नहीं होता यह व्याकरण के अंतर्गत रहकर ही कार्य करता है।
  • बोली को केवल मौखिक रूप से बोला जा सकता है परंतु इसकी कोई लिखित रचना नहीं की जा सकती जबकि मानक भाषा की लिखित रचना की जा सकती है।
  • वार्तालाप के दौरान बोली की शुद्धता या अशुद्धता को ध्यान में नहीं रखा जाता जबकि मानक भाषा की शुद्धता एवं अशुद्धता का पूर्ण ध्यान रखा जाता है।
  • बोली कि स्वयं की कोई लिपि नहीं होती जबकि मानक भाषा नागरी लिपि में लिखी जाती है।
  • बोली का उपयोग के केवल बोलने में ही किया जाता है परंतु मानक भाषा का उपयोग प्रादेशिक पत्राचार में किया जाता है।
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